भारत ने अब चीनी तकनीक के जरिए संभावित जासूसी को लेकर एक बड़ा और ठोस कदम उठाया है। यह निर्णय न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से अहम है, बल्कि भारत की रणनीतिक दूरदर्शिता का भी उदाहरण है।
चीन पर लंबे समय से आरोप लगते रहे हैं कि वह इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के माध्यम से दुनिया भर में जासूसी करता है। अब भारत ने चाणक्य नीति अपनाते हुए इस खतरे को गंभीरता से लेते हुए सीसीटीवी कैमरों की सख्त जांच की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
भारत का सख्त फैसला: हर कैमरा अब सुरक्षा जांच के घेरे में
भारत सरकार ने अब यह अनिवार्य कर दिया है कि देश में बेचे जाने वाले हर सीसीटीवी कैमरे की सुरक्षा जांच की जाएगी। इसमें सिर्फ हार्डवेयर ही नहीं, बल्कि सॉफ्टवेयर, नेटवर्क कोड, और कैमरे के सोर्स कोड तक की गहराई से जांच की जाएगी।
सूत्रों के अनुसार, भारतीय खुफिया एजेंसियों को कुछ तकनीकी सुराग मिले थे, जिनसे यह आशंका और भी प्रबल हो गई कि चीन इन कैमरों के माध्यम से संवेदनशील सूचनाएं हासिल करने की कोशिश कर सकता है।
यह कदम सीधा युद्ध भले न हो, लेकिन एक सधा हुआ साइबर और टेक्नोलॉजिकल वार जरूर है, जो चीन की चालों पर करारा वार कर रहा है।
विदेशी कंपनियों की मनमानी पर ब्रेक
इस नई नीति से खासकर उन कंपनियों को झटका लगा है, जो या तो सीधे चीन से उपकरण आयात करती थीं या जिनके सॉफ्टवेयर में चीनी लिंक मौजूद थे। अब वे किसी भी उत्पाद को भारत में बेचने से पहले सरकार द्वारा अधिकृत लैब में सुरक्षा जांच के लिए भेजने को बाध्य होंगी।
कई कंपनियों ने शिकायत की है कि इससे आपूर्ति शृंखला बाधित हो सकती है, लेकिन भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया है — “राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा।”
आत्मनिर्भर भारत और ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा
इस सख्त नीति का एक और बड़ा फायदा यह है कि इससे स्थानीय सीसीटीवी निर्माताओं को प्रोत्साहन मिलेगा। “मेक इन इंडिया” ब्रांड पर भरोसा बढ़ेगा, क्योंकि घरेलू उत्पादों की पारदर्शिता और सुरक्षा जांच में ज्यादा सहयोग की उम्मीद की जा सकती है।
अब भारत केवल सीमाओं पर ही नहीं, बल्कि डिजिटल मोर्चे पर भी चीन से मुकाबले के लिए तैयार है। चीन अब अच्छी तरह जान गया है कि भारत उसकी ‘जासूसी रणनीति’ को समझ चुका है और अब हर चाल पर पैनी नजर रखी जा रही है।
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