आज के तेज़ रफ्तार जीवन में नींद की कमी आम होती जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल थकान ही नहीं, बल्कि लगातार नींद न पूरी होने पर यह डिप्रेशन और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की शुरुआत भी कर सकता है। मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ने के कारण, नींद की गुणवत्ता और मात्रा पर ध्यान देना जरूरी हो गया है।
नींद और मानसिक स्वास्थ्य का संबंध
डॉक्टरों के अनुसार, नींद हमारे दिमाग और शरीर के लिए रीसेट का काम करती है। नींद पूरी न होने से हार्मोनल असंतुलन, तनाव और मूड स्विंग जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। लंबे समय तक नींद की कमी से दिमाग में सिरोटोनिन और डोपामाइन हार्मोन्स का स्तर घट सकता है, जो डिप्रेशन का कारण बनते हैं।
कितनी नींद है जरूरी
वयस्कों (18-60 साल): 7-9 घंटे
किशोर (14-17 साल): 8-10 घंटे
बच्चे (6-13 साल): 9-11 घंटे
बच्चे (3-5 साल): 10-13 घंटे
विशेषज्ञों का कहना है कि नींद की मात्रा के साथ-साथ गुणवत्ता भी बेहद अहम है। बीच-बीच में बार-बार जागना या नींद में खलल डाले जाने से मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है।
नींद न पूरी होने के कारण
ज्यादा स्क्रीन टाइम – मोबाइल और लैपटॉप की नीली रोशनी मेलाटोनिन हार्मोन को प्रभावित करती है।
तनाव और चिंता – मानसिक दबाव नींद को गहरी और लगातार होने से रोकता है।
अनियमित दिनचर्या – देर रात तक जागना और सुबह देर से उठना नींद के चक्र को बिगाड़ सकता है।
अनुचित खान-पान – भारी भोजन या कैफीन और अल्कोहल का सेवन नींद पर असर डालता है।
डॉक्टरों की सलाह
समान समय पर सोना और जागना – नींद के नियमित चक्र से शरीर और दिमाग दोनों को लाभ मिलता है।
सोने से पहले स्क्रीन टाइम कम करें – मोबाइल, टीवी और लैपटॉप से दूरी बनाएं।
आरामदायक और शांत वातावरण – सोने के कमरे को अंधेरा, ठंडा और शांत रखें।
ध्यान और हल्का व्यायाम – योग, मेडिटेशन या हल्की सैर से नींद बेहतर होती है।
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