बिहार की राजनीति की सबसे चर्चित सीटों में शुमार मोकामा इस बार फिर से सुर्खियों में है। यहां का मुकाबला महज दो उम्मीदवारों के बीच नहीं, बल्कि दो राजनीतिक धाराओं, दो दशकों की विरासत और दबदबे की लड़ाई बन चुका है। एक ओर हैं पूर्व विधायक और ‘बाहुबली’ छवि वाले अनंत सिंह, तो दूसरी ओर हैं वीणा देवी, जो लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के टिकट पर और ‘दादा’ सूरजभान सिंह की पत्नी होने के नाते राजनीतिक समीकरणों को नई दिशा दे रही हैं।
25 साल बाद आमने-सामने की टक्कर
अनंत सिंह और सूरजभान सिंह की पारिवारिक और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता नई नहीं है। दोनों नेताओं की जड़ें मोकामा की राजनीति में गहरी रही हैं। अब 25 साल बाद, इस सीट पर उनके परिवार फिर आमने-सामने हैं—इस बार मोर्चा संभाला है अनंत सिंह ने खुद और सामने हैं सूरजभान की पत्नी वीणा देवी। यह मुकाबला व्यक्तिगत प्रतिष्ठा, राजनीतिक वर्चस्व और क्षेत्रीय दबदबे का प्रतीक बन चुका है।
मुद्दे पीछे, शख्सियतें आगे
चुनाव प्रचार में स्थानीय मुद्दों की चर्चा कम और उम्मीदवारों के अतीत, छवि और प्रभाव की चर्चा ज्यादा हो रही है। अनंत सिंह ने जहां क्षेत्र में ‘जननायक’ के रूप में पहचान बनाई है, वहीं वीणा देवी अपने पति सूरजभान के लंबे राजनीतिक अनुभव और जातीय समीकरणों के सहारे मैदान में उतरी हैं।
अनंत सिंह का जनाधार खासकर यादव, कुर्मी और मुस्लिम मतदाताओं में मजबूत माना जाता है, जबकि वीणा देवी को सवर्णों और पासवान समाज का समर्थन मिलने की उम्मीद है। एलजेपी (रामविलास) को भाजपा के अप्रत्यक्ष समर्थन का भी लाभ मिल सकता है, जो इस मुकाबले को और रोचक बना रहा है।
जेल से राजनीति तक: अनंत की चुनौती
अनंत सिंह वर्तमान में कई आपराधिक मामलों में घिरे रहे हैं और जेल से चुनावी रणनीति संचालित कर रहे हैं। हालांकि, उनका जनाधार अब भी बना हुआ दिखता है। समर्थक उन्हें ‘बाहुबली’ नहीं, ‘जनता का नेता’ मानते हैं। वहीं, वीणा देवी खुद सांसद रह चुकी हैं और इस बार अपने प्रभावशाली परिवारिक नेटवर्क के जरिए जनता से जुड़ने की कोशिश कर रही हैं।
मुकाबले का असर प्रदेश राजनीति पर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मोकामा की यह टक्कर प्रदेश की जातीय और दबंग राजनीति के बदलाव का संकेत हो सकती है। यदि वीणा देवी अनंत सिंह को कड़ी टक्कर देती हैं या विजय प्राप्त करती हैं, तो यह मोकामा की सत्ता संतुलन को पूरी तरह पलट सकता है।
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