फुलझड़ी से ओजोन परत को खतरा, गोला-बारूद से नहीं?” – कुमार विश्वास का पटाखा बैन पर तंज

पटाखों पर प्रतिबंध को लेकर चर्चाएं जहां पूरे देश में गर्म हैं, वहीं इस पर अब कवि और पूर्व आम आदमी पार्टी नेता डॉ. कुमार विश्वास की तीखी प्रतिक्रिया भी सामने आई है। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से एक करारा तंज करते हुए पूछा, “गोला-बारूद से कोई नुकसान नहीं, पर चार फुलझड़ियों से ओजोन परत में छेद हो जाएगा?” — इस बयान ने एक बार फिर से पटाखा बैन और पर्यावरण नीति को लेकर बहस छेड़ दी है।

कुमार विश्वास का यह बयान उन तमाम आवाज़ों को बल देता है जो दीपावली जैसे सांस्कृतिक और धार्मिक पर्वों पर पर्यावरण के नाम पर प्रतिबंध लगाने को एकपक्षीय और पक्षपातपूर्ण मानते हैं। उनका मानना है कि जब बड़े पैमाने पर हथियारों का निर्माण, परीक्षण और युद्ध जैसी घटनाएं होती हैं, तब पर्यावरण की चर्चा नहीं होती, लेकिन जब आम जनता अपने पारंपरिक त्योहार मनाती है, तब अचानक प्रदूषण की बात जोर पकड़ लेती है।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ राज्यों में पटाखों पर पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध की अनुमति दी है, जिससे दीपावली के दौरान पारंपरिक पटाखों के इस्तेमाल पर रोक लग गई है। इस फैसले के समर्थन में जहां पर्यावरणविद् और स्वास्थ्य विशेषज्ञ खड़े हैं, वहीं दूसरी ओर धार्मिक और सांस्कृतिक संगठनों के साथ-साथ कई बुद्धिजीवी भी इसे एकतरफा कार्रवाई करार दे रहे हैं।

कुमार विश्वास ने अपने चिर-परिचित व्यंग्यात्मक अंदाज़ में लिखा कि “कभी पर्यावरण को बचाने के लिए हथियारों की फैक्ट्रियां बंद करवाई गई हैं? या युद्ध रोकने की कोई गंभीर कोशिश हुई है? लेकिन जब बात एक त्योहार की आती है, तो अचानक पर्यावरण पर ज्ञान की वर्षा होने लगती है।”

उनकी इस टिप्पणी को सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में समर्थन मिल रहा है। ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम पर हजारों लोगों ने उनकी बात को री-शेयर करते हुए लिखा कि यह “दोहरे मापदंडों” के खिलाफ एक सही आवाज़ है। वहीं कुछ लोग इसे अनावश्यक राजनीतिकरण भी बता रहे हैं।

पर्यावरण विशेषज्ञों की राय इस पर अब भी बंटी हुई है। कुछ का कहना है कि स्थानीय स्तर पर पटाखों का धुआं कुछ घंटों के लिए ही सही, लेकिन हवा की गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। दूसरी ओर, समाज के कुछ वर्गों का यह भी कहना है कि परंपराओं के साथ ऐसा व्यवहार धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा सकता है।

बहरहाल, कुमार विश्वास की यह टिप्पणी सिर्फ पटाखों तक सीमित नहीं है, बल्कि एक व्यापक सवाल भी उठाती है—क्या पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी केवल आम नागरिकों के कंधों पर ही है?

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