पंजाब की भगवंत मान सरकार ने दलित समुदाय के सम्मान और भारतीय संविधान की गरिमा की रक्षा को लेकर बड़ा कदम उठाया है। हाल ही में सोशल मीडिया पर फैले कुछ विवादित और आपत्तिजनक कंटेंट को लेकर सरकार ने तत्काल संज्ञान लेते हुए कड़ी कार्रवाई शुरू कर दी है। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने स्पष्ट किया कि “संविधान पर हमला और दलितों का अपमान अब किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”
यह कार्रवाई उस वक्त शुरू हुई, जब सोशल मीडिया पर कुछ हैंडल्स और अकाउंट्स से ऐसी सामग्री साझा की गई, जो ना सिर्फ संविधान की मूल भावना के खिलाफ थी, बल्कि दलित समुदाय की छवि को धूमिल करने वाली भी मानी गई।
आईटी सेल और साइबर यूनिट एक्टिव
पंजाब सरकार के आईटी सेल और साइबर क्राइम यूनिट को विशेष निर्देश दिए गए हैं कि वे ऐसे सभी अकाउंट्स और पेजों पर नजर रखें जो जातीय वैमनस्य फैलाने या संवैधानिक मूल्यों पर चोट करने की कोशिश कर रहे हैं।
सरकार की ओर से अब तक 50 से अधिक सोशल मीडिया अकाउंट्स को चिन्हित किया जा चुका है, जिनमें से कई को ब्लॉक करने और कानूनी नोटिस जारी करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
सख्त संदेश, सॉफ्ट स्पॉट नहीं
मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा,
“बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा रचित संविधान हमारी आत्मा है। जो भी उस आत्मा पर हमला करेगा, उसे कानूनी और सामाजिक दोनों स्तरों पर जवाब मिलेगा। दलित समाज के सम्मान की रक्षा करना हमारी नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी है।”
यह बयान एक सख्त संदेश के तौर पर देखा जा रहा है कि राज्य सरकार इस मुद्दे पर कोई “सॉफ्ट स्पॉट” रखने के मूड में नहीं है।
विपक्ष की प्रतिक्रियाएं
विपक्षी दलों ने सरकार की इस पहल को मिलाजुला समर्थन दिया है। कांग्रेस और अकाली दल के नेताओं ने कहा कि अगर सरकार वास्तव में इस दिशा में कठोर और निष्पक्ष कार्रवाई करती है तो यह समाज के लिए एक सकारात्मक उदाहरण बनेगा। हालांकि कुछ नेताओं ने इसे “राजनीतिक नौटंकी” कहकर भी खारिज करने की कोशिश की।
सोशल मीडिया कंपनियों को नोटिस
राज्य सरकार ने केंद्र के आईटी मंत्रालय के माध्यम से प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (जैसे फेसबुक, ट्विटर/एक्स, इंस्टाग्राम और यूट्यूब) को भी नोटिस भेजने की सिफारिश की है ताकि आपत्तिजनक सामग्री को तुरंत हटाया जा सके और जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई की जा सके।
क्या कहता है कानून?
जानकारों के अनुसार, संविधान का अपमान और दलितों के खिलाफ किसी भी प्रकार का भेदभाव SC/ST एक्ट, आईटी एक्ट, और भारतीय दंड संहिता (IPC) की कई धाराओं के तहत गंभीर अपराध है। यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो दोषियों को 5 से 7 साल तक की सजा हो सकती है।
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