विदेशी युवक ने भारत में रचा बिजनेस का इतिहास, 50 करोड़ की कंपनी की नींव

जब जुनून, दृष्टि और अवसर एक साथ मिलते हैं, तो असंभव भी संभव हो जाता है। ऐसा ही कुछ कर दिखाया है फ्रांस से भारत पढ़ाई करने आए एक विदेशी छात्र ने, जिसने कुछ ही वर्षों में भारत में 50 करोड़ रुपये के कारोबार की नींव रख दी। यह कहानी न केवल प्रेरणादायक है, बल्कि देश में बढ़ते स्टार्टअप कल्चर और विदेशी प्रतिभाओं के लिए अवसरों की झलक भी दिखाती है।

शुरुआत एक स्टूडेंट वीजा से

करीब 7 साल पहले फ्रांस के एक छोटे शहर से ज्यूलियन मार्टिन (Julien Martin) नाम का छात्र भारत आया था। उद्देश्य था – बेंगलुरु के एक प्रतिष्ठित बिजनेस स्कूल से एमबीए की पढ़ाई पूरी करना। हालांकि, भारत में आने के बाद ज्यूलियन को यहां की संस्कृति, बाजार और लोगों से इतना लगाव हो गया कि उन्होंने वापस फ्रांस लौटने की बजाय यहीं कुछ नया करने का फैसला किया।

एक विचार जो बना करोड़ों का कारोबार

पढ़ाई के दौरान ही उन्हें भारत के छोटे शहरों और गांवों में ऑर्गेनिक उत्पादों की कमी और शहरी इलाकों में इसकी बढ़ती मांग के बीच एक बड़ी संभावनाओं का अंदाज़ा हुआ। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने “PureHarvest Naturals” नाम से एक स्टार्टअप की शुरुआत की, जो ऑर्गेनिक फलों, सब्जियों और ग्रॉसरी उत्पादों की सप्लाई करता है।

इस व्यवसाय को उन्होंने बेंगलुरु से शुरू किया, जहां पहले तो उन्होंने केवल 5 किसानों के साथ पार्टनरशिप की। धीरे-धीरे यह नेटवर्क बढ़ता गया और आज 9 राज्यों के 500+ किसानों से सीधे जोड़कर उनका स्टार्टअप भारत के 20 से ज्यादा शहरों में उत्पाद सप्लाई कर रहा है।

टेक्नोलॉजी और ट्रांसपेरेंसी बना सफलता का आधार

PureHarvest की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने किसानों और उपभोक्ताओं के बीच किसी मिडलमैन की जरूरत नहीं रखी। मोबाइल ऐप और वेबसाइट के ज़रिए उपभोक्ता सीधे उत्पाद ऑर्डर करते हैं और किसानों को पारदर्शी मूल्य मिलता है। यही मॉडल उनकी लोकप्रियता की बड़ी वजह बनी।

लाखों में निवेश, करोड़ों में मुनाफा

शुरुआती निवेश केवल 12 लाख रुपये था, जो ज्यूलियन ने अपनी बचत और कुछ भारतीय दोस्तों की मदद से जुटाया था। आज, उनका सालाना टर्नओवर 50 करोड़ रुपये से भी अधिक है और कंपनी में 150 से ज्यादा कर्मचारी काम कर रहे हैं।

भारत में अवसरों की भरमार

ज्यूलियन का मानना है कि भारत एक ऐसा देश है जहां किसी भी इनोवेटिव विचार को मुकाम तक पहुंचाने के लिए न केवल संसाधन हैं, बल्कि लोग भी रिस्पॉन्सिव हैं। “भारत ने मुझे एक छात्र से उद्यमी बना दिया। मैं यहां की मिट्टी, किसानों और लोगों का कर्जदार हूं,” उन्होंने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा।

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