भारत की अध्यक्षता में जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान बिहार के मिथिला क्षेत्र की पारंपरिक और प्रसिद्ध चित्रशैली मधुबनी की धूम रही और इसने लगातार दुनिया भर से आए अतिथियों काे आकर्षित किया। जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान भारत मंडपम में आदिवासी कलाकृतियों की एक प्रदर्शनी लगायी गयी है जिसमें कई कलाओं का सजीव प्रदर्शन किया जा रहा है।इस प्रदर्शनी का उद्देश्य विदेशी नेताओं और अतिथियों को भारतीय कला, संस्कृति और धरोहर से परिचित कराना है।
प्रदर्शनी में मधुबनी चित्रशैली का सजीव प्रदर्शन करने वाली 60 वर्षीया महिला शांति देवी ने बताया कि मधुबनी चित्रशैली अपने जटिल विवरण और जीवंत रंगों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। कलाकार मनोरम और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण कलाकृतियों को बनाने के लिए केवल प्राकृतिक रंगों और टहनियों से बने ब्रश का उपयोग करते हैं। मध्यम आकार की कलाकृति का एक टुकड़ा बनाने के लिए अविश्वसनीय धैर्य और समर्पण की आवश्यकता होती है और एक प्रतिभाशाली कलाकार को एक उत्कृष्ट कृति बनाने में सात से 10 दिन लगते हैं।
मिथिला की मूल निवासी श्रीमती शांति देवी को उनकी उत्कृष्ट मधुबनी चित्रशैली ने न केवल प्रशंसा दिलाई है, बल्कि उनकी असाधारण शिल्प कौशल के लिए प्रतिष्ठित राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला है। मधुबनी चित्रशैली एक भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग से सुसज्जित है। इसकी उत्पत्ति बिहार के मिथिला क्षेत्र में हुई है। यह भारत के सबसे पुराने और सबसे जीवंत कला रूपों में से एक है, जिसका इतिहास 2,500 वर्षों से अधिक पुराना है।
श्रीमती शांति देवी ने बताया कि कोविड महामारी से पहले उनकी कलाकृतियां पांच हजार रुपये तक प्रति बिक जाती थी। इससे उनके परिवार को स्थायी आजीविका मिलती थी। उन्होेंने चंद्रयान -3 की सफलता पर मधुबनी चित्रशैली का एक चित्र बनाया है। उन्होंने कहा, “ यह अब मेरी सबसे बेशकीमती चित्रकारी है। मैं इसे बेचूंगी नहीं, बल्कि इसे तब तक अपने घर में रखूंगी जब तक मुझे इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को भेंट करने का मौका नहीं मिलता।”अपनी कला के माध्यम से वह अपने गांव, अपने राज्य और अपने देश के लिए एक दूत बन गई हैं। उन्होेंने कहा,“ मैं इस कला को संरक्षित करने के लिए अपनी ओर से यथासंभव प्रयास करूंगी और मुझे उम्मीद है कि मेरे बच्चे और पोते-पोतियां इस परंपरा को आगे बढ़ाएंगे।”
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