केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में पेश किए गए एक नए विधेयक ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। यह विधेयक प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने को लेकर एक नई प्रक्रिया निर्धारित करता है। सरकार का दावा है कि यह बिल लोक सेवकों को बेवजह कानूनी उत्पीड़न से बचाने के उद्देश्य से लाया गया है, जबकि विपक्ष इसे लोकतंत्र पर अंकुश और प्रशासनिक जवाबदेही में कमी के रूप में देख रहा है।
बिल में क्या-क्या प्रावधान हैं?
अनुमति के बिना मुकदमा नहीं
किसी भी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल करने से पहले सरकार की मंज़ूरी अनिवार्य होगी।
पूर्व अनुमति जरूरी
यदि किसी लोक सेवक पर उनके आधिकारिक कार्यकाल में किसी आपराधिक मामले में मुकदमा दर्ज करना हो, तो संबंधित सरकार से पूर्व स्वीकृति लेनी होगी।
सीबीआई-जांच पर लगाम?
अगर जांच एजेंसियां जैसे CBI या ED किसी मंत्री के खिलाफ जांच करना चाहें, तो पहले उन्हें केंद्र या राज्य सरकार से अनुमति लेनी होगी।
पूर्वव्यापी प्रभाव नहीं
यह कानून सिर्फ भविष्य में दर्ज मामलों पर लागू होगा; पुराने मामलों को इसमें शामिल नहीं किया जाएगा।
विपक्ष को क्यों है आपत्ति?
विपक्षी दलों का आरोप है कि यह विधेयक भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही लड़ाई को कमजोर करेगा। उनका कहना है कि:
यह बिल लोकपाल, RTI और स्वतंत्र जांच एजेंसियों की भूमिका को अप्रभावी बना सकता है।
इससे नेताओं को “कानूनी कवच” मिल जाएगा, और जवाबदेही घटेगी।
सरकार खुद ही तय करेगी कि किसके खिलाफ जांच हो और किसके खिलाफ नहीं – यह संविधान के सिद्धांतों के खिलाफ है।
कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “इस कानून से स्पष्ट संकेत मिलता है कि सत्ताधारी वर्ग खुद को कानून से ऊपर मानने लगा है।”
सरकार ने क्या दी सफाई?
सरकार ने इस विधेयक को लोकतंत्र के मूल्यों के अनुरूप बताया है। कानून मंत्री का कहना है कि, “यह बिल केवल उन मामलों को नियंत्रित करेगा जिनमें लोक सेवकों के कार्य को जानबूझकर राजनीतिक बदले की भावना से निशाना बनाया जाता है।” उन्होंने यह भी कहा कि यह कानून किसी को दोषमुक्त नहीं करता, बल्कि केवल यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी मंत्री पर आरोप लगे तो वह न्यायिक प्रक्रिया के दायरे में, बिना पूर्वाग्रह के, जांच के अधीन आए।
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