भारत में घी को पारंपरिक रूप से पोषण का एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता रहा है। परिवारों में अक्सर यह बहस छिड़ी रहती है कि बच्चों को घी कब से देना चाहिए और कितनी मात्रा सुरक्षित मानी जाती है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, घी बच्चों की वृद्धि और मस्तिष्क के विकास में सहायक हो सकता है, लेकिन इसकी शुरुआत उम्र के अनुसार और सीमित मात्रा में ही की जानी चाहिए।
बाल रोग विशेषज्ञों की मानें तो शिशु के छह महीने पूरे होने से पहले किसी भी प्रकार का ठोस या अतिरिक्त वसा, जिसमें घी भी शामिल है, नहीं देना चाहिए। इस उम्र तक बच्चा पूरी तरह माँ के दूध या फ़ॉर्मूला दूध पर निर्भर होता है। छह महीने के बाद जब ठोस आहार की शुरुआत की जाती है, तभी घी की थोड़ी मात्रा भोजन में मिलाई जा सकती है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि प्रारंभिक चरण में घी मात्र 1/4 चम्मच प्रतिदिन देना पर्याप्त है। यह मात्रा बच्चे की पाचन क्षमता को ध्यान में रखते हुए धीरे–धीरे बढ़ाई जा सकती है। जैसे–जैसे बच्चा एक वर्ष की उम्र पार करता है, उसकी दिन भर की घी की मात्रा एक चम्मच तक बढ़ाई जा सकती है। हालांकि, यह ध्यान रखना आवश्यक है कि बच्चे के भोजन में पहले से मौजूद वसा की मात्रा भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
डॉक्टरों का कहना है कि घी ऊर्जा का बेहतर स्रोत है और इसमें मौजूद फैटी एसिड मस्तिष्क के विकास के लिए लाभकारी हो सकते हैं। परंतु अत्यधिक घी से बच्चे में अपच, गैस या वजन तेजी से बढ़ने जैसी समस्याएँ भी हो सकती हैं। इसलिए मात्रा का संतुलन बेहद ज़रूरी है।
विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि यदि बच्चे को दूध से बनी चीज़ों या किसी वसा से एलर्जी की समस्या हो, तो घी शुरू करने से पहले बाल रोग विशेषज्ञ से परामर्श करना अनिवार्य है। बाजार से खरीदे हुए घी की जगह घर में तैयार ताज़ा घी शिशुओं के लिए अधिक सुरक्षित माना जाता है।
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