र्गी एक पुरानी न्यूरोलॉजिकल समस्या है, जिसमें बार-बार दौरे पड़ सकते हैं, जिससे मस्तिष्क की सामान्य कार्यप्रणाली बाधित होती है। मिर्गी के मरीजों को फोकस में दिक्कत हो सकती है, और तनाव, नींद की कमी या कुछ दवाएं इस स्थिति को और बढ़ा सकती हैं। इसके साथ ही, मिर्गी से जुड़े कई मिथक भी समाज में फैले हुए हैं, जिन्हें दूर करना जरूरी है ताकि मरीज इस बीमारी को बेहतर तरीके से मैनेज कर सकें।
क्या मिर्गी का दौरा मतलब चेतना खो देना?
डॉक्टर बताते हैं कि हर मिर्गी का दौरा चेतना खोने से जुड़ा नहीं होता।
👉 मिर्गी के दौरे दो प्रकार के होते हैं:
आंशिक (Partial) दौरे: इनमें मरीज की प्रतिक्रिया प्रभावित हो सकती है या जागरूकता में कमी आ सकती है।
जेनेरलाइज्ड (Generalized) दौरे: इसमें पूरे शरीर की मांसपेशियां अनियंत्रित रूप से हिलने लगती हैं।
मिथक: मिर्गी के दौरे में जीभ काटने से घुटन हो सकती है?
✅ सच्चाई: डॉक्टर बताते हैं कि मिर्गी के दौरान शरीर पर अस्थायी नियंत्रण कम हो सकता है।
दौरे के दौरान जीभ पीछे की ओर गिर सकती है, जिससे आंशिक रूप से घुटन हो सकती है।
जीभ काटना और मुंह से खून आना सामान्य घटना है, लेकिन यह घातक नहीं होती।
क्या करना चाहिए? मरीज को एक तरफ करवट दिलाकर लिटाना चाहिए, जिससे सांस लेने में परेशानी न हो।
मिथक: मिर्गी एक मानसिक बीमारी है?
✅ सच्चाई: मिर्गी एक न्यूरोलॉजिकल (मस्तिष्क से जुड़ी) समस्या है, मानसिक बीमारी नहीं।
मिर्गी और मानसिक बीमारी अलग-अलग स्थितियां हैं।
कुछ मामलों में तनाव या चिंता के कारण झटके आ सकते हैं, लेकिन यह साइकोजेनिक नॉन-एपिलेप्टिक सीजर (PNES) कहलाते हैं, जो मिर्गी के दौरे से अलग होते हैं।
PNES में मरीज जीभ नहीं काटता और पेशाब पर नियंत्रण नहीं खोता।
निष्कर्ष:
मिर्गी से जुड़े कई मिथक लोगों में गलतफहमी पैदा कर सकते हैं। सही जानकारी से मिर्गी को बेहतर तरीके से मैनेज किया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति मिर्गी का दौरा पड़ने पर सही प्रतिक्रिया नहीं देता, तो उसकी स्थिति बिगड़ सकती है। इसलिए, सही जानकारी रखें और मिर्गी मरीजों की मदद करें।
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