तेज़ होती जीवनशैली, बढ़ता तनाव और सामाजिक दबाव – ये सभी मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में डिप्रेशन (अवसाद) और एंग्ज़ायटी (चिंता) जैसी मानसिक स्थितियां तेजी से बढ़ रही हैं। अक्सर लोग इन दोनों को एक ही समस्या मान लेते हैं, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार, इनके लक्षण, कारण और इलाज अलग-अलग होते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी सही जानकारी होना बेहद जरूरी है ताकि वक्त रहते सही पहचान और उपचार हो सके।
डिप्रेशन के प्रमुख संकेत
डिप्रेशन सिर्फ उदासी नहीं है। यह एक मानसिक स्वास्थ्य विकार है, जो व्यक्ति के सोचने, महसूस करने और व्यवहार करने के तरीके को प्रभावित करता है।
इसके लक्षणों में शामिल हैं:
लगातार उदासी, निराशा या खालीपन महसूस करना
रुचियों में कमी आना – जो चीजें पहले पसंद थीं, उनमें आनंद न आना
भूख या वजन में अचानक कमी या वृद्धि
नींद में गड़बड़ी – बहुत ज्यादा या बहुत कम नींद आना
थकान, ऊर्जा की कमी
आत्मग्लानि या खुद को दोषी महसूस करना
आत्महत्या के विचार या आत्म-नुकसान की प्रवृत्ति
एंग्ज़ायटी के प्रमुख संकेत
एंग्ज़ायटी यानी चिंता एक स्वाभाविक भाव हो सकता है, लेकिन जब यह लगातार और अत्यधिक हो जाए, तो यह मानसिक स्वास्थ्य समस्या बन जाती है।
इसके लक्षणों में शामिल हैं:
बार-बार बेचैनी महसूस होना
दिल की धड़कन तेज़ होना
पसीना आना, कांपना
अनजानी आशंका या डर
सोच को काबू में रखने में परेशानी
नींद न आना या बार-बार जागना
पेट में घबराहट या अपच
दोनों में क्या है अंतर?
हालांकि डिप्रेशन और एंग्ज़ायटी में कुछ लक्षण एक जैसे हो सकते हैं, जैसे नींद की गड़बड़ी या थकावट, लेकिन दोनों की भावनात्मक प्रकृति और मानसिक प्रभाव अलग होते हैं।
डिप्रेशन में व्यक्ति अतीत में फंसा रहता है – वह उदास होता है, निराश होता है, उसे उम्मीद नहीं रहती।
एंग्ज़ायटी भविष्य को लेकर डर और घबराहट से जुड़ी होती है – व्यक्ति को हर समय कुछ अनहोनी का डर सताता है।
एक्सपर्ट की राय
मनोचिकित्सक डॉ. कहती हैं,
“डिप्रेशन और एंग्ज़ायटी दोनों गंभीर मानसिक स्थितियां हैं, लेकिन इनमें फर्क समझना बेहद जरूरी है। यदि व्यक्ति समय पर इनके संकेत पहचान ले, तो थेरेपी, मेडिकेशन और सही जीवनशैली से इन पर काबू पाया जा सकता है।”
वह यह भी बताती हैं कि दोनों स्थितियां एक साथ भी हो सकती हैं, जिसे “कॉमॉर्बिड कंडीशन” कहा जाता है, और इसका इलाज अधिक सतर्कता से करना होता है।
कैसे करें शुरुआत इलाज की?
लक्षण नजर आते ही काउंसलर या मनोचिकित्सक से संपर्क करें
नियमित दिनचर्या और पर्याप्त नींद लें
व्यायाम, ध्यान और योग को दिनचर्या में शामिल करें
परिवार और दोस्तों से खुलकर बात करें
सोशल मीडिया से दूरी और वास्तविक जीवन से जुड़ाव बढ़ाएं
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