सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दो प्रमुख व्हिस्की ब्रांड्स के बीच चले आ रहे ट्रेडमार्क विवाद की सुनवाई के दौरान टेट्रा पैक में शराब बेचने की प्रथा पर गंभीर सवाल उठाए। जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस ज्योमल्या बागची की बेंच ने इसे ‘बहुत खतरनाक’ और ‘भ्रामक’ बताते हुए राज्यों पर निशाना साधा, जो राजस्व के लालच में जन स्वास्थ्य को दांव पर लगा रहे हैं। बेंच ने कहा कि टेट्रा पैक जूस या दूध के कार्टन जैसा दिखता है, स्वास्थ्य चेतावनी नहीं देता और बच्चों के लिए आसानी से उपलब्ध हो जाता है। सुनवाई के दौरान दोनों कंपनियों के वकीलों ने टेट्रा पैक और कांच की बोतलें पेश कीं, जिसने कोर्ट रूम को हल्का-फुल्का माहौल दे दिया, लेकिन मुद्दे की गंभीरता पर किसी को शक नहीं रहा।
यह विवाद जॉन डिस्टिलरीज प्राइवेट लिमिटेड (ओरिजिनल चॉइस व्हिस्की) और एलाइड ब्लेंडर्स एंड डिस्टिलरीज प्राइवेट लिमिटेड (ऑफिसर्स चॉइस व्हिस्की) के बीच 2015 से चल रहा है। एलाइड ब्लेंडर्स ने ट्रेडमार्क रजिस्ट्री में जॉन डिस्टिलरीज के ‘ओरिजिनल चॉइस’ मार्क को रद्द करने की याचिका दायर की थी, दावा करते हुए कि यह उनके ‘ऑफिसर्स चॉइस’ से ध्वन्यात्मक और दृश्यात्मक रूप से समान है, जिससे उपभोक्ताओं में भ्रम पैदा होता है। इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी अपीलेट बोर्ड (IPAB) ने 2023 में जॉन डिस्टिलरीज के पक्ष में फैसला दिया, लेकिन मद्रास हाईकोर्ट ने 7 नवंबर 2025 को इसे पलट दिया और ‘ओरिजिनल चॉइस’ को रजिस्टर से हटाने का आदेश दिया। जॉन डिस्टिलरीज ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, जहां सुनवाई के दौरान वकील मुकुल रोहतगी ने कर्नाटक में टेट्रा पैक से 65% बिक्री का हवाला दिया। दोनों कंपनियों की कुल बिक्री 30,000 करोड़ रुपये से अधिक है, और दक्षिण भारत में टेट्रा पैक का बोलबाला है।
सुप्रीम कोर्ट ने पैकेजिंग पर फोकस करते हुए कहा, “यह क्या है – जूस का पैकेट? क्या सरकारें ऐसी पैकेजिंग की अनुमति देंगी?” जस्टिस कांत ने चिंता जताई कि टेट्रा पैक इतना हल्का और छोटा होता है कि स्कूल बैग में आसानी से छिपाया जा सकता है। “बच्चे इसे स्कूल ले जा सकते हैं, माता-पिता को शक भी नहीं होगा। स्वास्थ्य चेतावनी न होने से यह धोखा देता है।” जस्टिस बागची ने राज्यों की आलोचना की, “सरकारें राजस्व कमाने के चक्कर में जन स्वास्थ्य का सौदा कर रही हैं।” कोर्ट ने दोनों पक्षों से मध्यस्थता के जरिए समझौता करने को कहा और रिटायर्ड जस्टिस एल नागेश्वर राव को मीडिएटर नियुक्त किया। रोहतगी के हल्के-फुल्के कमेंट पर जस्टिस कांत ने मजाकिया लहजे में कहा, “आशा है कि बोतल के अंदर का माल बाहर जितना ही अच्छा हो।”
टेट्रा पैक पैकेजिंग कांच की बोतलों से सस्ती (प्रति यूनिट 10-15 रुपये बचत) और पर्यावरण-अनुकूल लगती है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक यह कांच से ज्यादा खतरनाक है। कांच की बोतलें भारी और टूटने वाली होती हैं, जिससे परिवहन में नुकसान होता है, लेकिन वे स्पष्ट रूप से शराब का प्रतीक हैं – लेबल, आकार और चेतावनियां सब कुछ उपभोक्ताओं को सतर्क रखती हैं। टेट्रा पैक, जो 2010 से कर्नाटक जैसे राज्यों में लोकप्रिय हो रहा है, जूस पैकेट जैसा दिखता है, जिससे नाबालिगों को आकर्षित करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें मिलावट मुश्किल होती है और ब्रेकेज शून्य, लेकिन स्वास्थ्य जोखिम ज्यादा हैं। 2013 में मुंबई हाईकोर्ट में एक PIL दायर हुई थी, जिसमें प्लास्टिक और टेट्रा पैक को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताया गया। ग्लास इंडस्ट्री ने खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय को शिकायत की कि टेट्रा पैक से रसायन रिस सकते हैं, खासकर शराब के एसिडिक स्वभाव से। कर्नाटक में 44% शराब बिक्री टेट्रा पैक से होती है, जो सस्ते ब्रांड्स को ग्रामीण बाजारों में पहुंचा रही है, लेकिन सामाजिक स्वीकार्यता बढ़ाने के बजाय ‘सस्ती शराब’ की छवि दे रही है।
राज्यों ने अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन कोर्ट के बयान से बहस तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि टेट्रा पैक राजस्व बढ़ाता है (कर्नाटक में अरबों रुपये), लेकिन बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य चेतावनियों की कमी से खतरा है। क्या यह पैकेजिंग पर पूर्ण प्रतिबंध लगेगा? या सिर्फ चेतावनियां जोड़ी जाएंगी? ट्रेडमार्क विवाद मध्यस्थता में चला गया, लेकिन टेट्रा पैक मुद्दा अब अलग से जांच का विषय बन सकता है। कुल मिलाकर, यह बहस शराब उद्योग की लागत बचत और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच संतुलन पर सवाल खड़ी कर रही है।
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