खांसी से शुरू होकर जान पर बन आती है, जानें टीबी के चार चरण

ट्यूबरकुलोसिस यानी टीबी भारत सहित दुनिया के कई देशों में एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार समय रहते पहचान और सही उपचार मिलने पर यह पूरी तरह ठीक होने वाली बीमारी है। इसके बावजूद जागरूकता की कमी और लक्षणों की अनदेखी इसे जटिल अवस्थाओं तक पहुँचा देती है। आम तौर पर टीबी की प्रगति को चार प्रमुख चरणों में समझा जाता है, हालांकि उपचार का निर्धारण रोग की गंभीरता और संक्रमित अंग के आधार पर किया जाता है।

पहला चरण: संक्रमण का प्रारंभ

इस चरण में टीबी का बैक्टीरिया शरीर में प्रवेश तो कर लेता है, लेकिन सक्रिय नहीं होता। इसे ‘लेटन्ट टीबी’ भी कहा जाता है। इस अवस्था में अधिकांश लोगों में किसी प्रकार के स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली बैक्टीरिया को नियंत्रण में रखती है। इस दौरान संक्रमित व्यक्ति दूसरों के लिए खतरा नहीं होता। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस स्तर पर बीमारी की पहचान हो जाए तो रोकथाम और उपचार दोनों आसान होते हैं।

दूसरा चरण: सक्रिय टीबी की शुरुआत

इस चरण को बीमारी का वह मोड़ माना जाता है जहां लक्षण उभरने लगते हैं। लगातार खांसी, हल्का बुखार, थकान और भूख में कमी जैसे संकेत धीरे-धीरे स्पष्ट होते हैं। फेफड़ों में संक्रमण बढ़ने पर बलगम में खून आना या सांस लेने में दिक्कत भी महसूस हो सकती है। सक्रिय टीबी होने पर संक्रमण फैलने की संभावना बढ़ जाती है। चिकित्सा समुदाय का मत है कि यह अवस्था उपचार शुरू करने का सबसे महत्त्वपूर्ण समय है। सही दवाओं और नियमित निगरानी से अधिकांश मरीज तेजी से सुधार अनुभव करते हैं।

तीसरा चरण: गंभीर या जटिल टीबी

यदि इलाज में देरी हो जाए या मरीज दवाओं को बीच में छोड़ दे, तो संक्रमण शरीर के अन्य अंगों तक फैलने लगता है। इसे एक्स्ट्रा-पल्मनरी टीबी कहा जाता है। गुर्दे, हड्डियों, मस्तिष्क या लसीका ग्रंथियाँ इस संक्रमण से प्रभावित हो सकती हैं। इस चरण में मरीज को लगातार तेज बुखार, तीव्र दर्द और वजन में अत्यधिक गिरावट का सामना करना पड़ सकता है। डॉक्टरों के अनुसार इस अवस्था में उपचार अधिक लंबा और चुनौतीपूर्ण हो जाता है।

चौथा चरण: जीवन के लिए जोखिम वाली अवस्था

टीबी का यह सबसे जटिल और खतरनाक चरण माना जाता है। जब संक्रमण फेफड़ों के बड़े हिस्से को नुकसान पहुँचा देता है या मस्तिष्क में टीबी मेनिन्जाइटिस जैसी स्थिति विकसित हो जाती है, तब मरीज की हालत गंभीर हो जाती है। इस चरण में सांस लेने में अत्यधिक कठिनाई, लगातार उलझन, बुखार और शरीर की कई प्रणालियों में गड़बड़ियाँ देखने को मिलती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यद्यपि इस स्तर पर भी इलाज संभव है, लेकिन मरीज की जान बचाना बेहद कठिन हो जाता है।

समय पर पहचान सबसे बड़ा बचाव

टीबी की जटिलता चाहे जो भी हो, चिकित्सा जगत का एकमत है कि प्रारंभिक चरण में पहचान और नियमित उपचार से रोगी पूरी तरह स्वस्थ हो सकता है। सरकार और स्वास्थ्य संस्थानों द्वारा चलाए जा रहे अभियान इसी जागरूकता को बढ़ाने पर केंद्रित हैं।

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