आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने दुनिया भर में तकनीकी क्रांति की गति को कई गुना तेज कर दिया है। चिकित्सा, शिक्षा, उद्योग और सार्वजनिक सेवाओं जैसे क्षेत्रों में AI के प्रभावशाली उपयोग ने जहां कई समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया है, वहीं विशेषज्ञ अब इसके छिपे हुए खतरों को लेकर गंभीर चेतावनी दे रहे हैं।
तकनीकी विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं का कहना है कि AI की अनियंत्रित और अनियमित प्रगति से न केवल नौकरियों पर संकट बढ़ सकता है, बल्कि यह सामाजिक असमानता, डेटा गोपनीयता, मानसिक स्वास्थ्य और यहां तक कि लोकतंत्र की प्रक्रियाओं पर भी प्रतिकूल असर डाल सकती है।
बढ़ता भरोसा, गहराता खतरा
AI आधारित टूल्स और सेवाओं के प्रति लोगों का भरोसा जितना बढ़ रहा है, उतना ही यह चिंता का विषय बनता जा रहा है कि क्या हम भविष्य में अपनी ही बनाई तकनीक पर निर्भरता के दुष्चक्र में फंस जाएंगे?
प्रसिद्ध AI विशेषज्ञ डॉ. रजत मेहरा के अनुसार, “AI एक दोधारी तलवार की तरह है। जहां यह काम को आसान और अधिक कुशल बनाता है, वहीं इसके जरिये फैलाया जा सकता है भ्रामक सूचना, किया जा सकता है डेटा का दुरुपयोग और प्रभावित किया जा सकता है जनमत।”
उन्होंने यह भी कहा कि Deepfake तकनीक, ऑटोमेटेड प्रोपेगेंडा और Chatbots जैसे टूल्स का दुरुपयोग समाज में भ्रम फैलाने और सामाजिक विभाजन बढ़ाने का हथियार बन सकता है।
नौकरियों पर संकट
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में ऑटोमेशन के चलते बड़ी संख्या में पारंपरिक नौकरियां समाप्त हो सकती हैं। खासकर बीपीओ, कस्टमर सर्विस, डाटा एंट्री, लेखांकन जैसे सेक्टर सबसे अधिक प्रभावित होंगे।
ILO (अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन) की एक रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण एशिया में AI के चलते 20% तक नौकरियां जोखिम में आ सकती हैं। इससे बेरोजगारी बढ़ने की आशंका के साथ-साथ सामाजिक तनाव भी बढ़ सकता है।
डेटा सुरक्षा और निजता पर सवाल
AI आधारित एप्लिकेशन और डिवाइस यूज़र्स के हर व्यवहार को रिकॉर्ड करते हैं, प्रोफाइल बनाते हैं और कई बार इनका उपयोग विज्ञापन, निगरानी या फिर जनमत को प्रभावित करने के लिए किया जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक कड़े डाटा संरक्षण कानून लागू नहीं होते, तब तक आम नागरिक की निजता खतरे में बनी रहेगी।
मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर
AI और सोशल मीडिया एल्गोरिद्म का गहरा प्रभाव युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर देखा गया है। निरंतर तुलना, फेक लाइफस्टाइल और आर्टिफिशियल इंटरेक्शन से अवसाद और अकेलापन बढ़ रहा है।
क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. श्रेया माथुर बताती हैं, “AI आधारित सिफारिश प्रणाली व्यक्ति को एक ‘इको चेंबर’ में डाल देती है, जहां उन्हें सिर्फ वही जानकारी मिलती है जो उनकी सोच को मजबूत करे। इससे समाज में सहिष्णुता और खुले विचारों का स्थान घटता जा रहा है।”
समाधान क्या?
विशेषज्ञों की राय है कि AI के प्रयोग के लिए वैश्विक स्तर पर नैतिक दिशानिर्देश, पारदर्शी एल्गोरिद्म और मजबूत डाटा संरक्षण कानून बनाए जाने चाहिए। साथ ही शिक्षा प्रणाली में भी AI से जुड़ी जागरूकता और नैतिकता को शामिल करना आवश्यक है।
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