चीन की विक्ट्री डे परेड में दिखे पुतिन और शरीफ, पीएम मोदी की अनुपस्थिति पर उठे सवाल

चीन की राजधानी बीजिंग में हाल ही में आयोजित की गई ‘विक्ट्री डे परेड’ में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और कई अन्य देशों के शीर्ष नेता शामिल हुए। यह आयोजन द्वितीय विश्व युद्ध में जापान पर चीन की जीत की वर्षगांठ के रूप में मनाया गया। जहां एक ओर यह समारोह चीन के कूटनीतिक शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है, वहीं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गैरहाजिरी ने कई राजनीतिक और रणनीतिक सवाल खड़े कर दिए हैं।

🇨🇳 चीन का शक्ति प्रदर्शन और कूटनीति

चीन ने इस आयोजन को बड़े स्तर पर आयोजित कर दुनिया को अपना सैन्य और राजनीतिक प्रभाव दिखाने की कोशिश की। इसमें चीन की सेनाओं की परेड, ऐतिहासिक झांकियां और अंतरराष्ट्रीय मेहमानों का स्वागत बड़े भव्य तरीके से किया गया। पुतिन और शरीफ जैसे नेताओं की मौजूदगी से यह परेड अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक विमर्श का केंद्र बन गई।

भारत की चुप्पी: रणनीति या असहमति?

प्रधानमंत्री मोदी की इस आयोजन में गैरमौजूदगी पर राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह कदम चीन के साथ मौजूदा सीमा विवाद और भूटान-अरुणाचल मुद्दे को लेकर भारत की नाराजगी का संकेत हो सकता है।

पूर्व राजनयिक और विदेश नीति विश्लेषक प्रो. आर.के. माथुर का कहना है,

“भारत की चुप्पी एक सधी हुई रणनीति हो सकती है। ऐसे आयोजनों में भागीदारी का मतलब चीन की नीति का अप्रत्यक्ष समर्थन होता, जो भारत के हितों के विरुद्ध जाता।”

रूस और पाकिस्तान की मौजूदगी के मायने

रूस और पाकिस्तान की उपस्थिति इस बात का संकेत है कि चीन अपने पड़ोसियों और सहयोगियों के साथ एक वैकल्पिक वैश्विक ध्रुव स्थापित करना चाहता है। खासकर रूस-चीन की निकटता और पाकिस्तान को कूटनीतिक मंच पर साथ लाना, भारत के लिए एक कूटनीतिक चुनौती हो सकता है।

इतिहास, राजनीति और वर्तमान संदर्भ

भारत और चीन के संबंध पिछले कुछ वर्षों में गलवान संघर्ष, सीमा तनाव और व्यापारिक प्रतिस्पर्धा के चलते बेहद तनावपूर्ण रहे हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी की अनुपस्थिति एक स्पष्ट संदेश हो सकता है कि भारत चीन की आक्रामक विदेश नीति के साथ खुद को सार्वजनिक मंच पर जोड़ना नहीं चाहता।

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