भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा से पहले एक विशेष धार्मिक परंपरा निभाई जाती है, जिसे स्नान यात्रा कहा जाता है। इस दिन भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को गर्भगृह से बाहर लाकर भक्तों को दर्शन कराए जाते हैं।
ज्येष्ठ पूर्णिमा के इस शुभ अवसर पर तीनों विग्रहों का विशेष जलाभिषेक होता है। और यह स्नान सामान्य जल से नहीं, बल्कि पुरी मंदिर के एक रहस्यमयी और पवित्र कुएं — ‘सोने के कुएं’ से लाए गए जल से किया जाता है। यह जल 108 कलशों में एकत्र कर प्रभु को स्नान कराया जाता है।
🔱 पुरी का ‘सोने का कुआं’ — आस्था, रहस्य और परंपरा का संगम
श्री जगन्नाथ मंदिर परिसर में स्थित यह प्राचीन कुआं, भक्तों और विद्वानों दोनों के लिए वर्षों से रहस्य का विषय बना हुआ है। इसकी विशेषता ये है कि यह कुआं साल में केवल एक बार, आषाढ़ पूर्णिमा (देव स्नान पूर्णिमा) के दिन ही खोला जाता है।
इस कुएं पर लगा ढक्कन लोहे और सीमेंट से बना होता है, जिसका वजन 1.5 से 2 टन तक है। इसे हटाने के लिए 12 से 15 सेवकों की जरूरत पड़ती है। सालभर यह ढक्कन बंद रहता है, और इसकी सुरक्षा में विशेष रूप से नियुक्त व्यक्ति “सुना गोसाईं” होते हैं।
💰 क्या सच में है इसमें सोना? इसलिए कहा जाता है ‘सोने का कुआं’
कहा जाता है कि पांड्य वंश के राजा इंद्रद्युम्न ने इस कुएं की दीवारों को सोने की ईंटों से सजवाया था। जब इसका ढक्कन खोला जाता है, तो भीतर की दीवारों पर अब भी वो चमकती ईंटें दिखाई देती हैं।
समय के साथ यह परंपरा बन गई कि श्रद्धालु कुएं में सोने की चूड़ियां, सिक्के और आभूषण अर्पित करने लगे। ढक्कन में बने एक छोटे छेद से लोग अपनी श्रद्धा समर्पित करते हैं। यह कुआं आज भी कितना गहरा है या उसमें कितना सोना है — यह एक अभेद रहस्य बना हुआ है, क्योंकि इसे आज तक कभी पूरी तरह खोदा नहीं गया।
🌸 जल से जुड़ी दिव्यता और भक्तों की आस्था का संगम
माना जाता है कि इस कुएं के जल में देशभर के पवित्र तीर्थों का सार समाहित है। यही कारण है कि भगवान जगन्नाथ का इस जल से स्नान एक दिव्य अवसर माना जाता है।
यह जलाभिषेक केवल पवित्रता नहीं, बल्कि ईश्वर के साक्षात दर्शन और भक्तों की आस्था का चरम क्षण होता है।
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