शिक्षा को समवर्ती सूची से हटाकर संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत राज्यों का विषय बनाने को लेकर पेश निजी संकल्प को लेकर शुक्रवार को राज्यसभा में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जमकर विवाद हुआ।
द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) के मोहम्मद अब्दुल्ला ने निजी संकल्प पेश करके यह मांग की। इस संकल्प में मेडिकल कालेजों में प्रवेश की परीक्षा नीट तथा इसे कराने वाली एजेन्सी राष्ट्रीय परीक्षा एजेन्सी (एनटीए)को समाप्त करने की भी मांग की गयी।
शिक्षा राज्य मंत्री जयंत चौधरी ने कहा कि नीट परीक्षा से संबंधित विषय सरकार के संज्ञान में है और उच्चतम न्यायालय ने इस बारे में आदेश भी दिया है। न्यायालय ने इस संबंध में एक समिति का गठन किया है। यह मामला न्यायालय के विचाराधीन है,इसलिए इस सदन को इस संकल्प पर चर्चा नहीं करनी चाहिए।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के जॉन ब्रिटास ने इसका विरोध करते हुए कहा कि नीट की परीक्षा न्यायालय के आदेश से शुरू नहीं हुई है बल्कि केन्द्र सरकार ने इसकी शुरूआत की थी। उन्होंने कहा कि इस संकल्प पर चर्चा न कराने के लिए न्यायालय का बहाना लेना गलत है।
दुमुक के तिरूचि शिवा ने कहा कि जब इस संकल्प पर जवाब दिया जायेगा उस समय विधेयक वापस लेने के लिए आग्रह किया जा सकता है।
भाजपा के घनश्याम तिवाड़ी ने भी कहा कि उच्चतम न्यायालय ने बार-बार इस परीक्षा तथा एनटीए की जरूरत को सही ठहराया है। इसलिए न्यायालय के आदेश और उसकी भावना को देखते हुए इस संकल्प पर चर्चा नहीं की जानी चाहिए।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा,“कोई भी सदन या सदस्यों के अधिकार को नहीं रोक रहा है, केवल मामला इतना है कि उच्चतम न्यायालय ने फैसला दिया है इसलिए हम इस विषय पर चर्चा नहीं करना चाहते।”
बाद में उप सभापति हरिवंश ने कहा कि इस संकल्प को पेश करने वाले सदस्य सदन में संकल्प पेश करके संक्षिप्त में अपनी बात रख सकते हैं और फिर सदस्यों द्वारा चर्चा में हिस्सा लेने के बाद विधेयक को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।
श्री अब्दुल्ला ने शिक्षा को समवर्ती सूची से निकाल कर संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत राज्य का विषय बनाये जाने से संबंधित संकल्प पर अपनी बात रखते हुए कहा कि एनटीए नीट परीक्षा कराने में पूरी तरह विफल रहा है और परीक्षा का प्रश्न पत्र लीक होने से यह मामला न्यायालय में पहुंच गया।
उन्होंने कहा कि अनेक राज्यों ने नीट परीक्षा को छात्रों के साथ पक्षपातपूर्ण बताते हुए इसका विरोध किया है। उन्होंंने कहा कि पेपर लीक होने और कुछ छात्रों को ग्रेस अंक दिये जाने से परीक्षा पर सवाल खड़े हुए हैं।
उन्होंंने कहा कि सरकार से अनुरोध है कि वह विधेयक लाकर शिक्षा को समवर्ती सूची से हटाकर इसे राज्यों की सूची में शामिल करे। नीट परीक्षा को समाप्त करके मेडिकल कालेजों में दाखिला कराने का अधिकार राज्यों को दिया जाये। नीट परीक्षा से प्रभावित छात्रों के परिजनों को एक करोड़ रुपये की राशि दी जाये।
भारतीय जनता पार्टी के डाॅ. अनिल सुखदेवराव बोंडे ने चर्चा में शामिल होते हुए इसे संघीय ढांच के विरूद्ध बताया और निजी संकल्प का विरोध किया। उन्होंने कहा कि पहले मेडिकल काॅलेजों में दाखिला बारहवीं के अंकों के आधार पर किया जाता था लेकिन बाद में बदलते समय के साथ एक संयुक्त परीक्षा की जरूरत महसूस हुई। पहले ऑल इंडिया प्री मेडिकल परीक्षा शुरू की गयी। उस समय छात्रों को अलग-अलग राज्यों के काॅलेजों के लिए अलग-अलग फाॅर्म भरने पड़ते थे। इससे छात्रों पर बोझ पड़ता था और गरीब परिवारों के बच्चे इसके लिए इसलिए कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में यह परीक्षा शुरू की गयी। उन्होंने कहा कि नीट की परीक्षा को रद्द किया जाना छात्रों के हित में नहीं है।
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