कल्पना कीजिए, आप अपने किसी प्रियजन से बात कर रहे हैं जो अब इस दुनिया में नहीं हैं — उनकी वही आवाज़, वही बोलने का अंदाज़, वही जवाब। सुनने में यह किसी साइंस-फिक्शन फिल्म का दृश्य लगता है, लेकिन आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) ने इसे आंशिक रूप से हक़ीक़त बना दिया है। हाल ही में ‘AI Deathbots’ या ‘Digital Afterlife Bots’ नामक तकनीक ने दुनिया भर में चर्चा छेड़ दी है।
क्या हैं AI Deathbots?
AI Deathbots वे चैटबॉट या डिजिटल प्रोग्राम हैं जो किसी व्यक्ति के वॉयस रिकॉर्ड, मैसेज, ईमेल, सोशल मीडिया डेटा और वीडियो क्लिप्स का उपयोग करके उसकी बोलचाल और सोचने का अंदाज़ दोबारा बना सकते हैं।
कंपनियाँ मशीन लर्निंग और डीपफेक टेक्नोलॉजी की मदद से ऐसा “डिजिटल अवतार” तैयार करती हैं, जो मृत व्यक्ति की तरह बात कर सकता है।
कुछ स्टार्टअप्स (जैसे अमेरिका की Project December और Replika AI) इस दिशा में प्रयोग कर रहे हैं।
लोग क्यों कर रहे हैं ऐसा प्रयोग?
AI Deathbots का सबसे बड़ा आकर्षण है — भावनात्मक जुड़ाव।
कई लोग किसी अपने के जाने के बाद उनकी यादों से संवाद करना चाहते हैं।
अमेरिका, चीन और दक्षिण कोरिया में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहाँ परिवार ने अपने दिवंगत सदस्य का एआई संस्करण तैयार कराया ताकि बच्चे उनसे “बात” कर सकें या उनकी आवाज़ सुन सकें।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह तकनीक “भावनात्मक थेरेपी” की तरह भी इस्तेमाल हो सकती है — पर इसके जोखिम कम नहीं हैं।
विशेषज्ञों की चेतावनी: यह सुकून भी, खतरा भी
टेक विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के बॉट डिजिटल भ्रम (illusion) पैदा कर सकते हैं।
लोग वास्तविकता और कल्पना के बीच की रेखा मिटाने लगते हैं।
मनोवैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि इससे भावनात्मक निर्भरता और मानसिक अस्थिरता बढ़ सकती है, क्योंकि व्यक्ति यह मानने लगता है कि उसका प्रियजन सच में “वापस” आ गया है।
इसके अलावा, डेटा गोपनीयता का खतरा भी बड़ा मुद्दा है।
अगर किसी व्यक्ति के जीवनकाल के डिजिटल रिकॉर्ड गलत हाथों में चले जाएं, तो कोई भी उसकी “डिजिटल कॉपी” बनाकर दुरुपयोग कर सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस क्षेत्र में स्पष्ट कानून और नैतिक दिशानिर्देश जरूरी हैं।
भारत में स्थिति क्या है?
भारत में अभी तक ऐसा कोई आधिकारिक प्रोजेक्ट नहीं शुरू हुआ है, लेकिन कई टेक कंपनियाँ वॉयस-आधारित एआई मेमोरी सिस्टम पर काम कर रही हैं।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि देश में डेटा प्रोटेक्शन कानून के तहत किसी मृत व्यक्ति की डिजिटल जानकारी के उपयोग को लेकर स्पष्टता नहीं है।
ऐसे में भविष्य में “एआई मृत्यु संवाद” को लेकर नैतिक बहस और तेज़ हो सकती है।
टेक्नोलॉजी बनाम भावनाएँ
AI Deathbots यह दिखाते हैं कि इंसान की तकनीक बनाने की क्षमता कितनी आगे बढ़ चुकी है — लेकिन यह भी सवाल उठता है कि क्या हमें हर भावना को डिजिटल बना देना चाहिए?
क्या किसी की आवाज़ सुनना ही उसकी “वापसी” कहलाएगी?
या यह हमारी यादों के साथ एक तकनीकी खेल है?
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