एक पिता अपने बेटे का हाथ पकड़े वहीं खड़ा था, जहां कभी उसका घर था। अब वहाँ सिर्फ मलबा है — बिखरी ईंटें, टूटी दीवारें, और कुछ अधजली तस्वीरें जो शायद यादों से भी पुरानी हो गई हैं।
6 महीने बाद, जब फलस्तीन के कई नागरिक अपने तबाह मोहल्लों में लौटे, तो उन्होंने देखा कि उनके आशियाने अब सिर्फ एक जख्म की तरह मिट्टी में दबे हैं। किसी को दरवाज़े का हैंडल मिला, किसी को अलमारी का टूटा पल्ला — ये सब किसी ज़माने में उनकी ज़िंदगी का हिस्सा थे।
ग़ज़ा पट्टी में इज़राइली हमलों के बाद हजारों घर पूरी तरह से नष्ट हो चुके हैं। राहत एजेंसियों के मुताबिक, करीब 60 प्रतिशत इन्फ्रास्ट्रक्चर तबाह हो चुका है और लाखों लोग अभी भी शिविरों या संयुक्त राष्ट्र की शरणस्थलों में रह रहे हैं।
65 वर्षीय अबू खालिद बताते हैं,
“यहां कभी मेरा दो मंज़िला मकान था। अब कुछ भी नहीं बचा। न कपड़े, न बर्तन, न बच्चों की तस्वीरें। सिर्फ एक दरार दिखती है ज़मीन में — वही अब मेरा पता है।”
ग़ज़ा के शुजाइया, बेइत हनून और खान यूनुस जैसे इलाकों में तबाही की तस्वीरें इतनी भयावह हैं कि स्थानीय लोग भी पहचान नहीं पा रहे कि उनका घर किस दिशा में था। सड़कें गड्ढों से भरी हैं, पानी की पाइपलाइनें टूट चुकी हैं और बिजली के खंभे राख में तब्दील हो गए हैं।
एक महिला, जिनका नाम हदील है, अपने आठ महीने के बच्चे को गोद में लिए मलबे के पास बैठी थीं। उन्होंने कहा,
“हम बचे ज़रूर हैं, लेकिन ज़िंदगी नहीं बची। यहां सिर्फ सन्नाटा है और एक डर — कि फिर कब हमला होगा।”
ग़ज़ा में लौटे लोगों को सबसे बड़ी चुनौती भोजन, पानी और मेडिकल सहायता की है। यूएन और रेड क्रॉस जैसी संस्थाएं सीमित संसाधनों के साथ राहत पहुंचा रही हैं, लेकिन ज़मीनी हालात बहुत नाजुक हैं।
मनोरंजन, स्कूल, अस्पताल — सब मिट चुके हैं। बच्चे मलबे के ढेर पर बैठकर खेलते हैं और बुजुर्ग दीवारों की दरारों में अपने बीते कल को खोजते हैं। एक और युवा फलस्तीनी युवक का कहना था,
“हमने युद्ध नहीं मांगा था, सिर्फ ज़िंदगी मांगी थी। अब मौत भी मंज़ूर है, लेकिन बेघर रहना नहीं।”
इस जमीनी हकीकत से दुनिया का सामना कराना जरूरी है, ताकि यह सिर्फ खबर बनकर न रह जाए — बल्कि एक वैश्विक चेतावनी बने कि युद्ध में जीत-हार नहीं होती, सिर्फ बर्बादी होती है।
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