अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 25% अतिरिक्त टैरिफ की घोषणा के बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कड़ा रुख अपनाया है। बुधवार को नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पीएम मोदी ने कहा, “मुझे मालूम है कि इस रास्ते पर चलने की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी, लेकिन भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा।” यह बयान ट्रम्प की उस चेतावनी के जवाब में आया है, जिसमें उन्होंने रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों, विशेष रूप से भारत, को 27 अगस्त, 2025 से लागू होने वाले नए टैरिफ का सामना करने की बात कही थी। आइए जानते हैं, इस कूटनीतिक तनाव के पीछे की वजह और भारत की रणनीति।
टैरिफ की पृष्ठभूमि
ट्रम्प ने अपनी दूसरी पारी में रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए आर्थिक दबाव की रणनीति अपनाई है। रूस पर नए प्रतिबंधों के साथ-साथ, उन्होंने उन देशों पर 25% टैरिफ लगाने की घोषणा की है जो रूस से तेल और गैस खरीद रहे हैं। भारत, जो रूस से अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 40% हिस्सा आयात करता है, इस नीति से सीधे प्रभावित होगा। ट्रम्प का कहना है कि यह कदम रूस की युद्ध मशीन को आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए जरूरी है, लेकिन भारत जैसे देश इसे अपनी ऊर्जा सुरक्षा पर हमला मान रहे हैं।
भारत की स्थिति
भारत ने रूस से सस्ते तेल के आयात को अपनी अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बताया है। 2022 के बाद से, जब पश्चिमी देशों ने रूस पर प्रतिबंध लगाए, भारत ने रियायती दरों पर रूसी तेल खरीदकर अपनी ऊर्जा लागत को नियंत्रित किया। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “भारत की ऊर्जा नीति राष्ट्रीय हितों और वैश्विक स्थिरता के बीच संतुलन बनाए रखने की है। हम किसी भी एकतरफा प्रतिबंध को स्वीकार नहीं करेंगे।”
पीएम मोदी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह भी जोड़ा कि भारत ने हमेशा शांति की वकालत की है और यूक्रेन संकट के समाधान के लिए रचनात्मक भूमिका निभाने को तैयार है। उन्होंने कहा, “हम ट्रम्प और पुतिन की प्रस्तावित मुलाकात का स्वागत करते हैं, लेकिन भारत अपने हितों की रक्षा के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाशेगा।”
आर्थिक और कूटनीतिक प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रम्प का टैरिफ भारत की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाल सकता है। भारतीय तेल कंपनियों, जैसे इंडियन ऑयल और भारत पेट्रोलियम, को रूसी तेल की जगह अधिक महंगे विकल्प तलाशने पड़ सकते हैं, जिससे पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं। “यह टैरिफ भारत की मुद्रास्फीति को बढ़ा सकता है, खासकर तब जब हम पहले से ही वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की चुनौतियों से जूझ रहे हैं।”
कूटनीतिक स्तर पर, भारत ने रूस के साथ अपने लंबे समय से चले आ रहे संबंधों को बनाए रखने की बात कही है। रूस भारत का प्रमुख रक्षा साझेदार रहा है, और हाल के वर्षों में दोनों देशों ने व्यापार को 50 बिलियन डॉलर तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। विदेश नीति विश्लेषक ने कहा, “भारत के लिए यह एक नाजुक संतुलन है। हमें न तो अमेरिका को नाराज करना है और न ही रूस के साथ रणनीतिक साझेदारी को कमजोर करना है।”
वैकल्पिक रणनीतियां
भारत पहले ही सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी देशों से तेल आयात बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। इसके अलावा, भारत अपनी नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं, जैसे सौर और पवन ऊर्जा, को तेज करने की योजना बना रहा है ताकि तेल आयात पर निर्भरता कम हो। केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने हाल ही में कहा कि भारत 2030 तक अपनी ऊर्जा जरूरतों का 20% नवीकरणीय स्रोतों से पूरा करने की दिशा में अग्रसर है।
वैश्विक प्रतिक्रिया
ट्रम्प के टैरिफ की घोषणा ने न केवल भारत, बल्कि चीन और अन्य रूस से तेल खरीदने वाले देशों को भी असमंजस में डाल दिया है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि ने कहा कि एकतरफा प्रतिबंध वैश्विक व्यापार व्यवस्था को नुकसान पहुंचाते हैं और विकासशील देशों पर अनुचित बोझ डालते हैं।
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