बिहार की सियासी फिज़ा एक बार फिर गर्म हो गई है। जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं, वैसे-वैसे राज्य में राजनीतिक बयानबाजी तेज़ हो गई है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को चुनावी मुद्दा बनाया जा रहा है। दूसरी तरफ, महागठबंधन के नेता तेजस्वी यादव अपनी रैलियों और वादों के ज़रिए युवा वोटर्स को साधने की कोशिश में जुटे हैं।
हालांकि, ज़मीनी समीकरण कुछ और ही तस्वीर पेश कर रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इस बार बिहार की जनता झूठे वादों और खोखली राजनीति के बजाय स्थिरता और विकास को प्राथमिकता दे रही है।
मोदी फैक्टर बना केंद्र बिंदु
राज्य में भाजपा नेताओं का स्पष्ट मानना है कि “बिहार मोदी का है और मोदी बिहार के हैं।” यही वजह है कि हर रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व, केंद्र की योजनाओं और ‘डबल इंजन सरकार’ के लाभ गिनाए जा रहे हैं। चाहे वह आयुष्मान भारत योजना हो या प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना — इन योजनाओं का असर बिहार के आम जनजीवन में दिख रहा है।
नीतीश कुमार के NDA में लौटने के बाद गठबंधन को सामाजिक समीकरणों में और मजबूती मिली है। भाजपा-जदयू की जोड़ी एक बार फिर पुराने फॉर्म में लौटती दिख रही है।
तेजस्वी की रणनीति पर सवाल
वहीं, तेजस्वी यादव लगातार युवाओं को नौकरी, शिक्षा और आरक्षण के मुद्दों पर लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन उनकी पिछली सरकार के दौरान हुए भ्रष्टाचार के आरोप और लालू परिवार की छवि अभी भी एक बड़ी बाधा के रूप में सामने हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि तेजस्वी की रणनीति भले ही युवा केंद्रित है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि जनता अब केवल वादों से संतुष्ट नहीं होती। उसे ठोस योजनाओं और ईमानदार नेतृत्व की दरकार है।
जनता का मूड क्या कहता है?
हालिया जनमत सर्वेक्षणों में यह बात सामने आई है कि प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता बिहार में अब भी बरकरार है। ग्रामीण इलाकों में केंद्र सरकार की योजनाओं का प्रभाव साफ देखा जा सकता है।
जहां एक ओर महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दे विपक्ष के हाथ में हैं, वहीं BJP समर्थकों का कहना है कि मोदी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा, विकास और वैश्विक मंचों पर भारत की स्थिति को मजबूत किया है।
क्या बदलेगा समीकरण?
बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण का भी खास महत्व रहा है। इस बार के चुनाव में भूमिहार, कुशवाहा, यादव और दलित वोट बैंक को लेकर बड़ी राजनीतिक बिसात बिछाई जा रही है। लेकिन NDA की कोशिश है कि मोदी के नाम पर वोटों का ध्रुवीकरण हो और विकास एजेंडे को केंद्र में रखा जाए।
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