भारतीय सिनेमा के सशक्त कलाकारों में शुमार मनोज बाजपेयी ने हाल ही में अपने पारिश्रमिक को लेकर खुलकर बातचीत की। मनोरंजन जगत में अपनी दमदार अभिनय क्षमता और विशिष्ट किरदारों के लिए पहचाने जाने वाले मनोज बाजपेयी ने कहा कि भले ही उन्हें दर्शकों और समीक्षकों का प्रेम भरपूर मिला हो, लेकिन फीस के मामले में वे आज भी उन चुनिंदा बड़े सितारों की श्रेणी में शामिल नहीं हो पाए हैं, जिन्हें भारी-भरकम रकम मिलती है।
एक कार्यक्रम के दौरान मनोज बाजपेयी ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा, “हम पर तो मनरेगा लग गया है… जितनी मेहनत करते हैं, उतनी कमाई नहीं होती। बड़े स्टार्स की जैसी फीस हमें कभी नहीं मिलती।” उनकी यह टिप्पणी मनोरंजन उद्योग में मौजूद असमानताओं की ओर इशारा करती है, जहां लोकप्रियता और बॉक्स ऑफिस संभावनाओं के आधार पर फीस का निर्धारण किया जाता है।
मनोज बाजपेयी ने कहा कि वर्षों की मेहनत, सैकड़ों ऑडिशन और कठिन सफर के बावजूद आज भी उन्हें पारिश्रमिक के हिसाब से खुद को संघर्षरत महसूस होता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी शिकायत निर्माताओं से नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था से है जिसमें कला से अधिक महत्व सितारा-स्थापित छवि को दिया जाता है। उनकी मान्यता है कि कलाकार का मूल्य उसके कौशल और योगदान से तय होना चाहिए, न कि केवल उसकी व्यावसायिक सफलता से।
अभिनेता ने यह भी बताया कि एक दौर ऐसा भी था जब उन्हें कई महत्वपूर्ण भूमिकाओं के लिए कम पारिश्रमिक स्वीकार करना पड़ा, सिर्फ इसलिए कि वे काम से जुड़े रह सकें और अपनी कला को दर्शकों तक पहुंचा सकें। उन्होंने कहा कि वे आज भी अपनी टीम और परिवार की जिम्मेदारियों को ध्यान में रखते हुए हर प्रोजेक्ट को सोच-समझकर चुनते हैं।
इंडस्ट्री के भीतर वेतन असमानता का मुद्दा नया नहीं है। कई मध्यम श्रेणी के कलाकारों ने समय-समय पर इस विषय पर आवाज उठाई है। मनोज बाजपेयी का बयान इस बहस को एक बार फिर केंद्र में ले आता है। वे बताते हैं कि बड़े पैमाने पर लोकप्रिय सितारों को जहां करोड़ों रुपये की फीस मिलती है, वहीं चरित्र कलाकारों और गंभीर अभिनेता वर्ग को इसके मुकाबले कहीं कम राशि दी जाती है, भले ही फिल्म की सफलता में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण क्यों न हो।
अभिनेता ने यह भी जोर देकर कहा कि वर्तमान OTT युग ने कलाकारों को अभिव्यक्ति के लिए नए अवसर उपलब्ध कराए हैं। “फैमिली मैन” जैसी वेब सीरीज की सफलता के बावजूद वे स्वयं को उसी स्थिति में पाते हैं, जहां उनकी प्रतिभा की तुलना आर्थिक पैमाने पर नहीं की जा रही। मनोज का मानना है कि ओटीटी प्लेटफॉर्म ने सामग्री आधारित सिनेमा को प्रोत्साहित किया है, लेकिन फीस की संरचना में अभी भी सुधार की बहुत गुंजाइश है।
इसके बावजूद अभिनेता ने भविष्य के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण व्यक्त किया। उनका विश्वास है कि दर्शकों का स्वाद बदल रहा है और प्रतिभा आधारित कंटेंट को अधिक सराहना मिल रही है। उन्होंने कहा कि यदि उद्योग पारदर्शिता और न्यायसंगत पारिश्रमिक मॉडल अपनाए, तो आने वाले वर्षों में कलाकारों का आर्थिक परिदृश्य बेहतर हो सकता है।
मनोज बाजपेयी की यह स्पष्टवादिता न केवल उद्योग की हकीकत को सामने लाती है, बल्कि कलाकारों के वास्तविक संघर्ष को भी उजागर करती है, जिसे अक्सर चमक-दमक के पीछे नजरअंदाज कर दिया जाता है।
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