मेल एक्टर्स को आराम, हमें संघर्ष’ — दीपिका पादुकोण ने उठाई जेंडर इक्वालिटी की आवाज़

बॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री दीपिका पादुकोण ने एक हालिया इंटरव्यू में फिल्म इंडस्ट्री में काम के घंटे और पारिश्रमिक (पेमेंट) को लेकर हो रहे जेंडर भेदभाव पर खुलकर अपनी बात रखी। उनका यह बयान सोशल मीडिया और फिल्म जगत में नई बहस छेड़ चुका है।

दीपिका ने कहा,

“मेल एक्टर्स सोमवार से शुक्रवार तक, दिन में 8 घंटे काम करते हैं। वहीं, महिला कलाकारों से उम्मीद की जाती है कि वे शूटिंग से पहले भी तैयार रहें, ब्रांड्स के लिए प्रमोशन करें, सोशल मीडिया पर एक्टिव रहें और फिर शूटिंग भी करें।”

सिर्फ अभिनय नहीं, हर मोर्चे पर काम की उम्मीद

दीपिका का मानना है कि आज की महिला कलाकारों को केवल कैमरे के सामने अच्छा अभिनय ही नहीं करना होता, बल्कि अपने लुक, पब्लिक इमेज, डिजिटल प्रजेंस और ब्रांड वेल्यू को बनाए रखने के लिए भी दिन-रात मेहनत करनी पड़ती है।

उन्होंने बताया कि कई बार ऐसा होता है जब मेल एक्टर्स केवल शॉट देकर चले जाते हैं, लेकिन फीमेल एक्टर्स को घंटों सेट पर इंतज़ार करना पड़ता है, साथ ही प्रेस, प्रमोशन और सोशल मीडिया स्ट्रैटेजी का बोझ भी उन्हीं पर रहता है।

पेमेंट गैप पर दो टूक बात

दीपिका ने फिल्म इंडस्ट्री में मेल और फीमेल एक्टर्स की पेमेंट को लेकर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा,

“जब हम एक ही फिल्म का हिस्सा होते हैं, एक जैसी मेहनत करते हैं, तो हमें उतना ही पारिश्रमिक क्यों नहीं मिलता?”

हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हर जगह स्थिति समान नहीं है। कुछ निर्माता और निर्देशक अब बदलाव की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं, लेकिन यह प्रक्रिया धीमी है।

सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया

दीपिका के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की राय बंट गई। एक वर्ग जहां उनकी बात को जरूरी और हकदार मानता है, वहीं कुछ का मानना है कि स्टार्स को पहले से ही तमाम सुविधाएं मिलती हैं।

हालांकि, इंडस्ट्री से जुड़ी कई महिला कलाकारों ने दीपिका के बयान का समर्थन किया है। अभिनेत्री तापसी पन्नू और भूमि पेडनेकर ने भी इससे पहले इसी तरह की चिंता जाहिर की थी।

एक बदलाव की शुरुआत या सिर्फ चर्चा?

यह पहली बार नहीं है जब दीपिका पादुकोण ने अपने विचारों को बेबाकी से सामने रखा हो। वह मानसिक स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण और इंडस्ट्री की कार्यप्रणाली जैसे मुद्दों पर अक्सर मुखर रही हैं।

उनका यह बयान महज एक शिकायत नहीं, बल्कि एक बदलाव की पुकार है — जो बताता है कि महिला कलाकार सिर्फ “शोपीस” नहीं, बराबरी की हकदार हैं।

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