सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अंग-दान और प्रत्यारोपण के क्षेत्र में चल रहे राज्यवार भेदभाव पर कड़ा रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने कहा, “जीवन बचाने का मामला है, इसमें राजनीति या राज्य सीमाएं नहीं चलेंगी। पूरे देश में एक समान अंग-दान और आवंटन नीति होनी चाहिए।” कोर्ट ने केंद्र को तीन महीने के अंदर राष्ट्रीय स्तर पर एकसमान नियम बनाने और नोटिफाई करने का सख्त निर्देश दिया। यह फैसला उस याचिका पर आया है जिसमें आरोप लगाया गया था कि कुछ राज्य डोमिसाइल के नाम पर गैर-निवासियों को अंग नहीं देते, जिससे मरीजों की जान खतरे में पड़ रही है।
याचिका एक्टिविस्ट गौरव बंसल और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने दायर की थी। उनका कहना था कि तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात जैसे राज्य अपनी नीति में स्पष्ट लिखते हैं कि राज्य में दान किए गए अंग पहले राज्य के मरीजों को दिए जाएंगे, उसके बाद ही बाहर के मरीजों को। इससे दूसरे राज्यों के मरीजों को इंतजार बढ़ जाता है और कई बार जान चली जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे “संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन” करार दिया।
कोर्ट ने कहा, “अंग-दान कोई व्यापार नहीं, यह मानवता का काम है। अगर कोई व्यक्ति अपना अंग दान करता है तो उसकी इच्छा होती है कि किसी की जान बचे, न कि सिर्फ अपने राज्य की। राज्य सरकारें अपनी सीमाएं तय करके मरीजों के साथ अन्याय कर रही हैं।” बेंच ने NOTTO (नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन) को भी फटकार लगाई कि वह सिर्फ कोऑर्डिनेशन करता है, लेकिन कोई बाध्यकारी नियम नहीं बना पाया।
कोर्ट के प्रमुख निर्देश
तीन महीने में पूरे देश के लिए एकसमान अंग-दान और आवंटन नीति बनाई जाए।
डोमिसाइल के आधार पर भेदभाव पूरी तरह खत्म हो।
नेशनल वेटिंग लिस्ट को और पारदर्शी बनाया जाए।
हर राज्य में अलग से प्राथमिकता सूची बनाने पर रोक।
सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट से समय मांगा था, लेकिन कोर्ट ने साफ कहा, “यह मामला 10 साल से लंबित है। अब और देरी बर्दाश्त नहीं।” कोर्ट ने अगली सुनवाई 18 फरवरी 2026 तय की है और तब तक नई नीति नोटिफाई करने को कहा है।
याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने फैसले के बाद कहा, “यह जीवन रक्षक फैसला है। अब एक गरीब मरीज को भी उतना ही हक मिलेगा जितना अमीर को।” वहीं, नोट्टो के पूर्व डायरेक्टर डॉ. अनिल कुमार ने कहा, “कोर्ट का फैसला स्वागतयोग्य है। अब राष्ट्रीय रजिस्ट्री और एकसमान नीति से अंगों का दुरुपयोग रुकेगा।”
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से पूरे देश में अंग-दान और प्रत्यारोपण व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव आने की उम्मीद है। अब तक भारत में हर साल करीब 5 लाख लोग अंग फेल्योर से मर जाते हैं, जबकि सिर्फ 15-20 हजार प्रत्यारोपण हो पाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि एकसमान नीति लागू होने से यह आंकड़ा कई गुना बढ़ सकता है।
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