ऑस्कर विनिंग फिल्म RRR के सिनेमेटोग्राफर सेंथिल कुमार की पत्नी का मल्टिपल ऑर्गन फेलियर के कारण निधन हो गया है. हम अपने आर्टिकल के जरिए जानेंगे आखिर क्या है मल्टीपल ऑर्गन फेल्यिर? शरीर पर क्या होता है असर. साथ ही जानें इसके शुरुआती कारण और लक्षण. फिजीकल एक्टीविटीज किसी भी इंसान के लिए बेहद जरूरी होता है. जो जितना मेहनत करता है उसकी इम्युनिटी उतनी मजबूत होती है.
कोरोना महामारी ने हमें सिखाया है कि अच्छा खानपान और लाइफस्टाइल एक इंसान के लिए कितना ज्यादा जरूरी होता है. आज हम बात करेंगे मल्टीपल ऑर्गन फेलियर की शिकायत कब होती है? जब इंसान के शरीर में एक साथ दो ऑर्गन काम करना बंद कर दें तो उस स्थिति में मल्टीपल ऑर्गन फेलियर की संभावना बढ़ जाती है.
कैसे किसी शरीर मल्टीपल फेलियर ऑर्गन का होती है शिकार
कोई भी गंभीर इंफेक्शन या किसी भी तरह के चोट में सूजन बढ़ रही है. और यह दूसरे ऑर्गन को भी प्रभावित कर रहा है तो इस बीमारी का खतरा बढ़ जाता है. मल्टीपल ऑर्गन सिस्टम फेलियर को मल्टीपल ऑर्गन डिसफंक्शन सिंड्रोम के रूप में जाना जाता है. यह मरीज के लिए बेहद खतरनाक होता है. इस स्थिति में पीड़ित की जान भी जा सकती है. ये सिंड्रोम चोट, इंफेक्शन, हाइपरमेटाबॉलिज्म और हाइपोपरफ्यूजन के कारण होता है.
मल्टीपल ऑर्गन फेलियर का कारण
मल्टीपल ऑर्गन फेलियर किसी एक वजह से नहीं बल्कि कई वजह से हो सकती है. हालांकि, ऑर्गन सिंड्रोम को सेप्सिस से ट्रिगर किया जा सकता है. चोट, संक्रमण, हाइपरमेटाबॉलिज्म और हाइपोपरफ्यूजन की वजह से ये सिंड्रोम होता है. ऐसी स्थिति में साइटोकिन्स सेल्स का निर्माण कार्य अहम भूमिका निभाता है. इसी दौरान सेल्स को मैसेज भेजकर इम्यून सिस्टम को एक्टिव रखा जाता है. शरीर में ब्रैडीकिनिन प्रोटीन्स ज्यादा होने पर भी मल्टीपल ऑर्गन फेलियर होता है.
मल्टीपल ऑर्गन फेलियर के लक्षण
शरीर में ब्लड सर्कुलेशन ठीक से नहीं हो पाता है.
शरीर में सूजन आना और ब्लड क्लॉट बनना.
शरीर ठंड महसूस होना.
मांसपेशियों में दर्द शुरू हो जाना.
दिनभर पेशाब न आना.
सांस लेने में ज्यादा परेशानी होना.
त्वचा का बेजान पड़ जाना.
मल्टीपन ऑर्गन फेलियर का असर किन अंगों पर होता है
फेफड़े
हार्ट
किडनी
लीवर
ब्रेन
ब्लड
मल्टीपल ऑर्गन फेलियर का इलाज
एक रिसर्च और हेल्थ एक्सपर्ट के मुताबिक, दुनिया में अगर किसी का कोई अंग फेल हो जाता है तो उसका इलाज काफी हद तक कारगर है. पिछले 20 साल में देखा जाए तो इससे प्रभावित मरीज की मृत्यु दर में काफी कमी है. अगर समय रहते सिम्टम्स पहचान लिए जाए और जांच करा लिया जाए तो इससे बचाव हो सकता है. जब भी इसके लक्षण नजर आए तो डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. डॉक्टर इंफेक्शन और ब्लड क्लॉट बनने की जांच करेंगे. इसके साथ ही कई और टेस्ट भी होते हैं. जिसके बाद इलाज चलता है.
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