भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सोमवार रात स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अचानक इस्तीफा दे दिया, जिससे देश की सियासत में हलचल मच गई है। हालांकि सरकारी सूत्रों ने इसे “स्वाभाविक फैसला” बताया है, लेकिन विपक्ष खासकर कांग्रेस इस दावे को मानने को तैयार नहीं है। पार्टी का कहना है कि इस्तीफे के पीछे स्वास्थ्य नहीं, कोई बड़ा राजनीतिक कारण छुपा है।
कांग्रेस की दो आवाजें: तारीफ भी, तंज भी
धनखड़ के इस्तीफे के तुरंत बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने उन्हें संविधान और लोकतंत्र का पक्षधर बताते हुए सार्वजनिक रूप से तारीफ की। उन्होंने कहा कि धनखड़ ने किसानों की आवाज़ उठाई, न्यायपालिका की जवाबदेही की बात की और विपक्ष को यथासंभव मंच दिया।
लेकिन रमेश के इस बयान ने पार्टी के भीतर विवाद खड़ा कर दिया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने तुरंत पार्टी लाइन स्पष्ट करते हुए कहा,
“धनखड़ साहब जाएं या रहें, कांग्रेस को फर्क नहीं पड़ता। यह मोदी सरकार का आंतरिक मामला है। जनता के असल मुद्दों से ध्यान न भटकाएं।”
खरगे के इस बयान के बाद रमेश ने चुप्पी साध ली और यह स्पष्ट हो गया कि कांग्रेस धनखड़ के इस्तीफे को संदेह की नजर से देखती है।
विपक्ष की आशंका: इस्तीफा दबाव में?
कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों का मानना है कि धनखड़ को जबरन इस्तीफा दिलवाया गया है। लोकसभा चुनाव के बाद बदले सियासी समीकरणों में उपराष्ट्रपति पद की भूमिका और उनके तेवर सरकार के कुछ फैसलों से मेल नहीं खा रहे थे। इसी वजह से भीतर ही भीतर मतभेद उभरने लगे थे।
यही कारण है कि कांग्रेस नेता सवाल उठा रहे हैं कि जिस धनखड़ को कभी “लोकतंत्र विरोधी”, “सत्तापक्ष समर्थक” और “पक्षपातपूर्ण” कहा गया था, आज उनके इस्तीफे पर सहानुभूति और तारीफ क्यों की जा रही है?
राजनीतिक हलचल अभी बाकी है
धनखड़ के इस्तीफे को लेकर सत्तापक्ष की ओर से कोई ठोस विवरण नहीं दिया गया है। वहीं राष्ट्रपति भवन से भी केवल औपचारिक स्वीकृति की पुष्टि हुई है। ऐसे में सवाल यही है — क्या यह महज स्वास्थ्य कारण था या सियासी शतरंज की कोई चाल?
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