वर्तमान दौर में जब लोग हेल्थ कॉन्शियस होते जा रहे हैं, मैदा यानी रिफाइंड फ्लोर को अक्सर ‘सफेद ज़हर’ कहा जाने लगा है। लेकिन क्या वास्तव में मैदा इतना हानिकारक है, जितना कि कहा जाता है? इस लेख में हम मैदे से जुड़े चार आम मिथकों और उनके पीछे छिपे तथ्यों पर नज़र डालते हैं।
मिथ 1: मैदा पूरी तरह से पोषक तत्वों से रहित होता है
फैक्ट:
मैदा गेहूं से ही बनाया जाता है। फर्क बस इतना है कि इसमें से चोकर (ब्रैन) और जर्म हटा दिए जाते हैं, जिससे यह अधिक महीन और सफेद बन जाता है। यह सच है कि मैदे में फाइबर कम होता है, लेकिन इसे पूरी तरह ‘पोषण रहित’ कहना गलत होगा। कई देशों में, भारत सहित, मैदे को फॉलिक एसिड, आयरन और अन्य विटामिन्स से फोर्टिफाई भी किया जाता है।
मिथ 2: मैदा खाने से डायबिटीज हो जाती है
फैक्ट:
मैदा हाई ग्लायसेमिक इंडेक्स वाला होता है, यानी यह शरीर में जल्दी शुगर में बदलता है। लगातार और अत्यधिक सेवन से ब्लड शुगर लेवल बढ़ सकता है, लेकिन यह कहना कि “मैदा डायबिटीज का कारण है” एक सरलीकृत धारणा है। असल समस्या है – असंतुलित डाइट और बैठा हुआ जीवनशैली।
मिथ 3: मैदा वजन बढ़ाता है
फैक्ट:
मैदा युक्त फूड्स जैसे समोसे, पिज्जा, केक, बिस्किट आदि आमतौर पर हाई कैलोरी और ट्रांस फैट से भरपूर होते हैं। वजन बढ़ने का कारण खुद मैदा नहीं, बल्कि उसमें मौजूद अतिरिक्त चीनी, तेल और प्रोसेसिंग होती है। यदि सीमित मात्रा में और संतुलित डाइट में लिया जाए, तो मैदा वजन बढ़ाने का मुख्य कारण नहीं है।
मिथ 4: मैदा खाने से पेट की समस्याएं होती हैं
फैक्ट:
मैदा फाइबर में कम होने के कारण कब्ज जैसी समस्याएं बढ़ा सकता है, खासकर अगर व्यक्ति की डाइट में अन्य फाइबर युक्त आहार न हो। परंतु यदि डाइट में पर्याप्त पानी, सब्जियां और फल शामिल हों, तो यह समस्या काफी हद तक टाली जा सकती है। समस्या मैदा में नहीं, उसकी मात्रा और सेवन के तरीके में है।
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