मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति में शनिवार का दिन ऐतिहासिक रहा, जब राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे दो दशकों के लंबे अंतराल के बाद पहली बार एक मंच पर साथ नजर आए। मराठी अस्मिता के नाम पर हुए इस मंचन ने न सिर्फ राजनीतिक हलचल मचा दी, बल्कि यह भी संकेत दे दिया कि आगामी बीएमसी और स्थानीय निकाय चुनावों में समीकरण बदल सकते हैं।
जहां राज ठाकरे ने मंच से सीएम फडणवीस पर तीखे तंज कसे, वहीं उद्धव ठाकरे ने सीधे तौर पर बीजेपी पर निशाना साधा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर दोनों भाइयों को एक साथ लाने की पटकथा किसने लिखी?
जब चौंक गए राजनीतिक पंडित
राजनीतिक विश्लेषक लंबे समय से मानकर चल रहे थे कि राज और उद्धव का मेल असंभव है। जब ‘सामना’ में दोनों भाइयों की एक साथ तस्वीर छपी, तब भी इसे हल्के में लिया गया। लेकिन 5 जुलाई को वर्ली में जब दोनों भाई सार्वजनिक मंच पर साथ आए, तो पूरे महाराष्ट्र की राजनीति में चर्चा का भूचाल आ गया।
रश्मि ठाकरे की खुशी, सुप्रिया सुले की भूमिका
कार्यक्रम में रश्मि ठाकरे की मुस्कान सब कुछ कह गई। वह मंच पर सबसे ज्यादा भावुक और खुश नजर आईं। इस “मेल-मिलाप मिशन” में सबसे अहम भूमिका निभाई एनसीपी (SP) की सांसद सुप्रिया सुले ने।
कार्यक्रम के बाद सुप्रिया ने आदित्य ठाकरे और अमित ठाकरे को मंच पर हाथ मिलवाया और एक पारिवारिक तस्वीर के लिए सभी को एकत्र किया। उनकी मौजूदगी और सक्रियता ने यह साफ कर दिया कि वह सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि “सियासी सेतु” थीं।
पवार रणनीति का हिस्सा?
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि भले ही शरद पवार स्वयं मंच पर नहीं दिखे, लेकिन यह “ठाकरे मिलन” उनकी रणनीति का ही हिस्सा था। राज ठाकरे पहले ही कह चुके हैं कि “पवार और ठाकरे ब्रांड कभी खत्म नहीं होंगे।” इस घटना ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया।
ठाकरे एकता से बीजेपी-शिंदे पर दबाव
अगर यह एकता लंबे समय तक बनी रहती है और दोनों भाई स्थानीय निकाय चुनावों में साथ आते हैं, तो इससे न सिर्फ बीजेपी को रणनीति बदलनी पड़ेगी, बल्कि सबसे ज्यादा दबाव सीएम एकनाथ शिंदे पर आएगा। शिवसेना कार्यकर्ताओं के बीच भी इस मिलन को लेकर जबरदस्त उत्साह है।
हालांकि, सत्ता पक्ष का दावा है कि यह मेल “अस्थायी” है और दोनों भाई ज्यादा समय तक एक साथ नहीं रह पाएंगे। आने वाले चुनाव नतीजे ही यह तय करेंगे कि यह मेल रणनीति थी या स्थायी एकता।
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