आज सुप्रीम कोर्ट में प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट (1991) से संबंधित कई याचिकाओं पर सुनवाई होने जा रही है। इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस पीवी संजय कुमार और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच करेगी। इस कानून के तहत किसी भी धार्मिक स्थल के धार्मिक स्वरूप में बदलाव पर रोक लगाई जाती है, और यह कानून 15 अगस्त 1947 के समय के धार्मिक स्वरूप को बनाए रखने का प्रावधान करता है।
केंद्र सरकार का जवाब अभी तक लंबित
इस मामले में केंद्र सरकार को कोर्ट में अपना जवाब दाखिल करना था, लेकिन अब तक यह जवाब नहीं आया है। केंद्र को मार्च 2021 में नोटिस जारी किया गया था, लेकिन चार साल बाद भी रिपोर्ट दाखिल नहीं हो सकी है। केंद्र ने कई बार समय की मांग की, और कोर्ट ने पिछले साल 12 दिसंबर तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था, लेकिन अब तक यह जवाब प्राप्त नहीं हुआ।
केंद्र के जवाब पर टिकी है मामले की दिशा
केंद्र सरकार का जवाब इस मामले के भविष्य को तय करेगा। पिछली सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि केंद्र का जवाब आए बगैर केस पर आगे की सुनवाई नहीं हो सकती। केंद्र सरकार यह बता सकती है कि इस कानून को किस मंशा से लाया गया था, और क्या वह इसमें कोई बदलाव करने पर विचार कर रही है। साथ ही केंद्र कानून में संशोधन करने के लिए बिल भी पेश कर सकता है।
ओवैसी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
कोर्ट ने प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट को प्रभावी ढंग से लागू करने की याचिका पर भी विचार शुरू किया था। AIMIM के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने यह याचिका दायर की थी। इसके अलावा अश्विनी उपाध्याय समेत कई हिंदू नेताओं ने इस एक्ट के खिलाफ याचिका दायर कर इसे असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है।
कई याचिकाएं लंबित, भ्रामक हो सकता है कानून का भविष्य
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में कुल 7 याचिकाओं पर सुनवाई होनी है, जिनमें अश्विनी उपाध्याय, स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती, सुब्रमण्यम स्वामी और अन्य लोगों द्वारा दायर की गई याचिकाएं शामिल हैं। इस कानून के खिलाफ जमीयत उलमा-ए-हिंद, इंडियन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और अन्य मुस्लिम संगठनों ने भी याचिकाएं दायर की हैं। उनका कहना है कि इस कानून पर विचार करने से देशभर में मस्जिदों और धार्मिक स्थलों के खिलाफ मुकदमों की बाढ़ आ सकती है।
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