बांग्लादेश की राजनीति में पिछले कुछ दिनों से अप्रत्याशित हलचल देखने को मिल रही है। पूर्व प्रधानमंत्री और आवामी लीग की नेता शेख हसीना ने अचानक चार अहम मुद्दों पर अपना रुख बदल दिया है। यह बदलाव केवल बांग्लादेश की घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं, बल्कि इसके संकेत नई दिल्ली तक महसूस किए जा रहे हैं। सवाल यही उठ रहा है — क्या शेख हसीना किसी बड़े राजनीतिक ‘गेम प्लान’ की तैयारी कर रही हैं?
1. अमेरिका के खिलाफ रुख में नरमी
कई महीनों तक अमेरिका पर अपनी सरकार के खिलाफ साजिश रचने का आरोप लगाने वाली हसीना अब शांत हो गई हैं। उन्होंने हाल ही में एक बयान में कहा कि “अब किसी को दोष देने से बेहतर है देश के भविष्य पर ध्यान दिया जाए।” यह बयान उसी नेता का है, जिन्होंने कुछ ही समय पहले वाशिंगटन पर विपक्ष को समर्थन देने का आरोप लगाया था। विश्लेषकों का कहना है कि यह यू-टर्न शायद बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों का परिणाम है।
2. पाकिस्तान को लेकर बदला सुर
जहां एक समय शेख हसीना पाकिस्तान को खुलकर कोसती थीं, वहीं अब उनके लहजे में नरमी आ गई है। उन्होंने कहा, “पड़ोसी देशों के साथ बेहतर संबंध क्षेत्रीय स्थिरता के लिए जरूरी हैं।” बांग्लादेश के राजनीतिक हलकों में इसे एक बड़ी रणनीतिक चाल माना जा रहा है, क्योंकि इससे दक्षिण एशिया में नए राजनयिक समीकरण बन सकते हैं।
3. सेंट मार्टिन द्वीप विवाद से पीछे हटना
बंगाल की खाड़ी में स्थित सेंट मार्टिन द्वीप को लेकर शेख हसीना पहले अमेरिका और म्यांमार पर तीखे बयान दे चुकी थीं। लेकिन अब उन्होंने कहा है कि यह “संवेदनशील मुद्दा” है और इसे सार्वजनिक मंचों पर नहीं उठाया जाना चाहिए। जानकारों का मानना है कि यह बयान उनके ‘संतुलित विदेश नीति’ अपनाने की ओर इशारा करता है।
4. अमेरिका-ट्रम्प को लेकर बदला रुख
पहले अमेरिका के नेताओं को बांग्लादेश की राजनीति में हस्तक्षेप का दोष देने वाली हसीना अब डोनाल्ड ट्रम्प की तारीफ कर रही हैं। उन्होंने कहा कि “ट्रम्प एक मजबूत नेता हैं, जिनसे बहुत कुछ सीखने को मिल सकता है।” इस टिप्पणी को कई राजनीतिक पर्यवेक्षक एक कूटनीतिक संकेत मान रहे हैं — शायद हसीना अपने पुराने रिश्तों को फिर से सुधारने की कोशिश में हैं।
भारत की भूमिका और नई दिल्ली की चिंता
नई दिल्ली इन घटनाओं पर बारीकी से नज़र रख रही है। भारत-बांग्लादेश संबंध लंबे समय से स्थिर और आपसी सहयोग पर आधारित रहे हैं, लेकिन शेख हसीना का अचानक बदला रुख कुछ सवाल खड़े कर रहा है। क्या वे घरेलू दबाव के कारण अपना एजेंडा बदल रही हैं या फिर यह किसी बड़े रणनीतिक बदलाव की शुरुआत है?
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