कांग्रेस ने बेच दिया था पेट्रोलियम मंत्रालय? निशिकांत दुबे का बड़ा दावा, पेश किए 70 साल पुराने दस्तावेज

भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ सांसद निशिकांत दुबे ने कांग्रेस पर एक बार फिर गंभीर आरोपों की बौछार कर दी है। इस बार उन्होंने कांग्रेस को निशाने पर लेते हुए दावा किया है कि “देश की सबसे पुरानी पार्टी ने पेट्रोलियम मंत्रालय को लगभग बेच ही दिया था”। इस आरोप को पुख्ता करने के लिए उन्होंने 1950 के दशक के कथित दस्तावेजों का हवाला भी दिया है।

दुबे ने लोकसभा में बयान देते हुए कहा कि आज जब देश ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब यह जानना जरूरी है कि पिछले दौर की सरकारों ने देश की प्राकृतिक संपत्तियों का किस तरह से निजी हाथों में सौदा किया था।

निशिकांत दुबे ने क्या कहा?

लोकसभा में एक विशेष चर्चा के दौरान निशिकांत दुबे ने कहा:

“कांग्रेस ने 70 साल पहले भारत के पेट्रोलियम मंत्रालय को विदेशी कंपनियों के हाथों सौंपने की तैयारी कर दी थी।”

उन्होंने कहा कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने ब्रिटिश और अमेरिकी कंपनियों को विशेष रियायतें देकर भारतीय तेल संसाधनों पर अधिकार दे दिया था। दुबे ने यह भी आरोप लगाया कि “उस समय देशहित से ज्यादा विदेशी हितों को प्राथमिकता दी गई थी।”

बकौल दुबे, यह सब सिर्फ राजनीतिक गठजोड़ और विदेशी दबावों के चलते हुआ। उन्होंने कहा कि अब जब मोदी सरकार ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत की बात कर रही है, तो यह जानना ज़रूरी है कि शुरुआत में किन नीतियों ने देश को पीछे धकेला।

पेश किए ऐतिहासिक दस्तावेज

दुबे ने सदन में भाषण के दौरान कुछ पुराने सरकारी कागजात और फाइल नोटिंग्स दिखाईं, जिनके अनुसार 1952 से 1956 के बीच कुछ समझौतों में विदेशी कंपनियों को तेल खोज और दोहन की खुली छूट दी गई थी।

उन्होंने दावा किया कि

“इन दस्तावेजों से स्पष्ट है कि उस समय भारतीय हितों की अनदेखी करते हुए विदेशियों को रणनीतिक संसाधनों तक पहुंच दी गई थी।”

कांग्रेस का पलटवार

कांग्रेस ने निशिकांत दुबे के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि यह “इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की कोशिश है”। पार्टी प्रवक्ताओं ने कहा कि अगर दुबे के पास कोई वैध दस्तावेज हैं, तो उन्हें संसदीय जांच या न्यायिक समीक्षा के लिए पेश किया जाना चाहिए।

कांग्रेस नेताओं ने यह भी तर्क दिया कि आजादी के बाद के शुरुआती वर्षों में तकनीकी और आर्थिक संसाधनों की कमी के कारण देश को कई क्षेत्रों में सहयोग की आवश्यकता थी, और उसी के तहत कुछ समझौते किए गए थे।

राजनीतिक निहितार्थ

यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में लोकसभा चुनाव 2024 के बाद नई सरकार गठन की चर्चा हो रही है और विपक्ष केंद्र सरकार को महंगाई व पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर घेरने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में दुबे का बयान राजनीतिक पलटवार की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इतिहास को लेकर इस तरह के बयान सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच आगामी महीनों में और तीखी बहस की भूमिका तैयार कर सकते हैं।

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