भारत सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर की सफलता को वैश्विक मंचों पर प्रस्तुत करने के लिए एक सर्वदलीय शिष्टमंडल गठित किया है। इस शिष्टमंडल का नेतृत्व कांग्रेस सांसद शशि थरूर को सौंपा गया है। सरकार के इस फैसले को राजनैतिक समावेशिता और राष्ट्रीय हित की दिशा में एक सकारात्मक पहल माना जा रहा है।
🔁 इतिहास खुद को दोहरा रहा है
यह निर्णय 1988 और 1994 की घटनाओं की याद दिलाता है जब तत्कालीन कांग्रेस सरकारों ने विपक्षी नेता अटल बिहारी वाजपेयी को भारत का अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधित्व करने भेजा था। वर्ष 1994 में प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने वाजपेयी को जेनेवा में भारत का पक्ष रखने के लिए चुना था। उस समय विदेश राज्य मंत्री सलमान खुर्शीद उनके साथ गए थे।
🇮🇳 शशि थरूर: अनुभव और वाकपटुता का संगम
संयुक्त राष्ट्र में लंबे कार्यकाल और विदेश मामलों पर पकड़ रखने वाले शशि थरूर को प्रतिनिधिमंडल की अगुआई सौंपना एक सुविचारित निर्णय माना जा रहा है। वे पहले भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की बात मजबूती से रख चुके हैं। उनका भाषण कौशल और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की समझ उन्हें इस जिम्मेदारी के लिए उपयुक्त बनाती है।
🔄 कांग्रेस की नाराज़गी, भाजपा की सराहना
हालाँकि, कांग्रेस का कहना है कि उसने थरूर का नाम प्रस्तावित नहीं किया था, वहीं भाजपा का कहना है कि मोदी सरकार ने राजनीति से ऊपर उठकर एक विद्वान नेता को चुना है।
भाजपा नेताओं ने कहा कि:
“जब देश का सवाल हो, तब सरकार-पर विपक्ष का भेद नहीं होना चाहिए।”
🔍 पूर्व उदाहरण: जब अटल जी विपक्ष में होते हुए भी भारत का चेहरा बने
वर्ष 1994 की तरह, जब पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत के खिलाफ प्रस्ताव लाया था, वाजपेयी ने उसे ध्वस्त कर दिया। सलमान खुर्शीद ने भी तब कहा था:
“अटल जी विपक्ष में ज़रूर थे, मगर विदेश में वे हमारे नेता थे।”
🤝 विपक्ष का प्रतिनिधित्व: परंपरा रही है, विवाद नहीं
भारत में विपक्षी नेताओं को ऐसे प्रतिनिधिमंडलों में शामिल करना कोई नई बात नहीं रही है। यह राष्ट्रीय एकता और परिपक्व लोकतंत्र का प्रतीक माना जाता रहा है। लेकिन इस बार, कांग्रेस की नाराज़गी और भाजपा की सराहना के बीच मुद्दा चर्चा में है।
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