बिहार में महिला‑उद्यमी योजना पर विवाद: विपक्ष बोला‑ यह ‘घूस’ है

बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र घोषित महिला‑उद्यमी सहायता योजना को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। राज्य में सत्ता में बैठे नितीश कुमार‑नेता वाले गठबंधन द्वारा महिलाओं को उठाने‑उद्यम शुरू करने हेतु ₹10,000 की राशि सीधे बैंक खातों में देने की घोषणा की गई थी।

इस घोषणा के तुरंत बाद विपक्षी पार्टियों ने इसे चुनाव के पहले दिए जाने वाला उपहार बताया है, जिसमें महिलाओं को वोट के बदले में लाभ पहुंचाया जा रहा है।

विश्लेषकों का कहना है कि यह कदम केवल सामाजिक‑आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को सशक्त बनाने का प्रयास नहीं है, बल्कि आगामी चुनाव में महिला मतदाताओं को आकर्षित करने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

विपक्ष का तर्क है कि ऐसी योजनाएँ जब चुनाव के करीब पेश की जाती हैं और तत्काल लाभ देने का वादा करती हैं, तो उन्होंने वोट‑लुभावनी उपायों की श्रेणी में आ जाती हैं। यह बात प्रशांत किशोर ने भी कही है — उन्होंने इस योजना को “औपचारिक घूस” बताया है जो वोट के बदले राशि देने जैसा प्रतीत होता है।

दूसरी ओर सरकार का कहना है कि यह राशि महिलाओं को स्वरोजगार या उद्यम स्थापित करने में मदद के लिए है। उन्होंने दावा किया है कि इससे महिला‑शक्ति को बढ़ावा मिलेगा और उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया जा सकेगा। मीडिया रिपोर्ट्स में यह योजना लगभग 75 लाख महिलाओं को सीधे‑भुगतान (DBT) रूप से राशि देने वाली बताई गई है।

हालाँकि, योजना के समय‑चक्र, चयन प्रक्रिया, तथा इस राशि के बाद उद्यम के वास्तविक क्रियान्वयन को लेकर कई सवाल उठे हैं। योजना घोषणा तथा चुनाव के बीच की अवधि कम होने के कारण, विपक्ष ने इस पर चुस्ती दिखाते हुए कहा है कि यदि कुछ महिलाओं को प्रभावित किया जा रहा है, तो उससे दूर‑दराज की महिलाएं व लाभार्थी सीधे इससे बाहर रह सकती हैं — जिससे सामाजिक असंतोष की संभावना है।

चुनावी माहौल में ऐसे कार्यक्रमों की सार्वजनिक घोषणा और लाभार्थियों को राशि हस्तांतरण चुनावी आचार‑संहिता (Model Code of Conduct) के संदर्भ में भी भारी चर्चा में हैं। विपक्ष का कहना है कि चुनाव प्रचार के दौरान ऐसी योजनाओं को लाया जाना निष्पक्ष प्रक्रिया की नींव को कमजोर कर सकता है।

प्रभावित महिलाओं के लिए यह राशि तत्काल राहत का विकल्प हो सकती है, पर योजना के वास्तविक उदयोग और सतत लाभ‑प्राप्ति पर अभी निगाहें बनी हुई हैं। आने वाले दिनों में यह देखा जाना होगा कि उक्त राशि से कितनी महिलाएँ वास्तव में उद्यम शुरू करती हैं, उन्हें क्या‑क्या सुविधाएं मिलती हैं, और यह योजना चुनाव से परे सामाजिक‑आर्थिक बदलाव ला पाती है या नहीं।

इस अभियान के बीच, जनता विशेष रूप से यह सोच में है — क्या यह महिला सशक्तिकरण का कदम है या सिर्फ चुनावी रणनीति का हिस्सा? इस सवाल का जवाब आने वाले समय में कार्यक्रम के क्रियान्वयन एवं उसके असर से मिलेगा।

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