हसीना पर मौत की सजा, चीन ने कही चौंकाने वाली बात: ‘ये बांग्लादेश का आंतरिक मामला’

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना पर मौत की सजा के फैसले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक हलचल तेज कर दी है। ढाका की इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (आईसीटी) ने सोमवार को हसीना और पूर्व गृह मंत्री आसदुज्जमान खान कमाल को ‘मानवता के खिलाफ अपराधों’ के लिए फांसी की सजा सुनाई। यह फैसला गत वर्ष छात्र-नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों पर सरकार की कथित क्रूर कार्रवाई से जुड़ा है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 1,400 से अधिक लोग मारे गए थे। हसीना, जो अगस्त 2024 से भारत में निर्वासन में रह रही हैं, ने फैसले को ‘राजनीतिक साजिश’ करार देते हुए इसे ‘कंगारू कोर्ट’ का नतीजा बताया। लेकिन इस बीच चीन ने साफ तौर पर हाथ खड़े कर दिए और इसे बांग्लादेश का ‘घरेलू मामला’ बता दिया।

चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने मंगलवार को बीजिंग में प्रेस ब्रीफिंग के दौरान कहा, “यह बांग्लादेश का आंतरिक मामला है।” उन्होंने कोई विस्तृत टिप्पणी करने से इनकार कर दिया, लेकिन जोर देकर कहा कि चीन बांग्लादेश के लोगों के प्रति हमेशा मित्रवत नीति अपनाए रखेगा। “हम आशा करते हैं कि बांग्लादेश एकजुटता, स्थिरता और विकास हासिल करेगा,” माओ ने कहा। यह बयान ऐसे समय आया है जब बांग्लादेश की अंतरिम सरकार, मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में, भारत से हसीना और कमाल के प्रत्यर्पण की मांग कर रही है। ढाका ने दोनों देशों के बीच प्रत्यर्पण संधि का हवाला देते हुए तत्काल कार्रवाई की अपील की है, लेकिन नई दिल्ली ने अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी।

हसीना का 15 वर्षों का शासन बांग्लादेश में विवादास्पद रहा। 1975 में उनके पिता शेख मुजीबुर रहमान की हत्या के बाद सत्ता में लौटीं हसीना ने आर्थिक सुधारों के साथ-साथ भ्रष्टाचार, यातनाओं और जबरन गुमशुदगी के आरोपों का सामना किया। 2024 के छात्र आंदोलन ने उनके खिलाफ जनाक्रोश को चरम पर पहुंचा दिया, जब पुलिस और सुरक्षा बलों ने लाइव गोलीबारी की। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर टर्क ने मृतकों की संख्या 1,400 बताई, जबकि मानवाधिकार संगठनों ने इसे ‘राजनीतिक दमन’ का प्रतीक कहा। आईसीटी ने हसीना को अनुपस्थिति में दोषी ठहराया, जबकि पूर्व पुलिस महानिरीक्षक चौधरी अब्दुल्लाह अल-मामुन को गवाही देने पर मात्र पांच वर्ष की सजा दी गई। हसीना ने बयान जारी कर कहा, “मुझे निष्पक्ष बचाव का मौका नहीं दिया गया। मैंने केवल अराजकता रोकने के लिए सद्भाव से काम किया।”

चीन का न्यूट्रल रुख दक्षिण एशिया की जटिल भू-राजनीति को दर्शाता है। बीजिंग ने हसीना के शासनकाल में बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के तहत बांग्लादेश में अरबों डॉलर के निवेश किए, लेकिन आंदोलन के बाद यूनुस सरकार के साथ संबंध सुधारने की कोशिश की। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन का ‘हाथ खड़े करना’ बांग्लादेश की नई सत्ता को मान्यता देने का संकेत है। “चीन क्षेत्रीय स्थिरता चाहता है, लेकिन हस्तक्षेप से बच रहा है,” इंडिया इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च ऑन स्ट्रैटेजिक स्टडीज के निदेशक राजीव सिकरी ने कहा। संयुक्त राष्ट्र ने भी मौत की सजा पर अफसोस जताया। महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के प्रवक्ता स्टीफन दुजारिक ने कहा, “हम हर परिस्थिति में मौत की सजा के खिलाफ हैं।” ह्यूमन राइट्स वॉच ने अंतरिम सरकार से आग्रह किया कि वह हसीना के समर्थकों को दबाने का काम न दोहराए।

भारत के लिए यह फैसला चुनौतीपूर्ण है। हसीना की मेजबानी करने वाला नई दिल्ली अब प्रत्यर्पण के दबाव में है। विदेश मंत्रालय ने कहा, “हम ‘रचनात्मक संलग्नता’ जारी रखेंगे।” लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भारत बांग्लादेश के साथ संबंधों को संतुलित रखने के लिए सतर्क रहेगा। ढाका में फैसले के बाद उत्सव हुआ, जहां लोग राष्ट्रीय ध्वज लहराते नजर आए। लेकिन हसीना समर्थक अवामी लीग ने इसे ‘राजनीतिक बदला’ बताते हुए विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी।

यह घटना बांग्लादेश की अस्थिरता को उजागर करती है। यूनुस सरकार ने न्याय का वादा किया था, लेकिन मौत की सजा ने सवाल खड़े कर दिए। क्या प्रत्यर्पण होगा? या हसीना का निर्वासन लंबा चलेगा? चीन का बयान साफ है – ‘ये तुम्हारा घरेलू झगड़ा है, हम बस दोस्त बने रहेंगे।’ आने वाले दिनों में दक्षिण एशिया की राजनीति पर इसका असर दिखेगा।

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