बिहार में कांग्रेस अब अपनी पुरानी राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश में जुट गई है। लोकसभा चुनाव में तीन सीटें जीतने के बाद कांग्रेस को नई ऊर्जा मिली है, और इसी के साथ उसने राज्य में अपने संगठन को धार देने की कवायद तेज कर दी है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी मंगलवार को पार्टी के बिहार नेताओं के साथ बैठक करेंगे, जिसमें 2025 के विधानसभा चुनाव की रणनीति पर मंथन होगा।
कांग्रेस अब गठबंधन की राजनीति से आगे बढ़ने को तैयार?
कांग्रेस ने बिहार में आरजेडी के साथ गठबंधन के बावजूद अपनी स्वतंत्र सियासी पहचान बनाने की कोशिश शुरू कर दी है। पार्टी ने प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी बदलकर संकेत दे दिया है कि अब वह अपने दम पर खड़ा होने की रणनीति अपना रही है।
पटना में जब कांग्रेस के नए प्रभारी कृष्णा अल्लावरू और मीडिया प्रभारी पवन खेड़ा से आरजेडी के साथ गठबंधन पर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने कहा –
“समय आने पर इस सवाल का जवाब मिल जाएगा।”
वहीं, सोमवार को लालू प्रसाद यादव की रोजा इफ्तार पार्टी में कांग्रेस के किसी बड़े नेता की गैरमौजूदगी ने भी सियासी गलियारों में चर्चाओं को हवा दे दी है।
बिहार में कांग्रेस की नई रणनीति – दलित वोट बैंक पर नजर
बिहार में कांग्रेस नई जातीय गणित के साथ आगे बढ़ रही है। इसी कड़ी में भूमिहार समाज से आने वाले अखिलेश प्रसाद सिंह को हटाकर दलित समाज से आने वाले राजेश कुमार को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है।
“राहुल गांधी सामाजिक न्याय और जातिगत जनगणना के मुद्दे को जोर-शोर से उठा रहे हैं, ऐसे में बिहार की कमान दलित नेता को सौंपना कांग्रेस की बड़ी रणनीति का हिस्सा है।”
दिल्ली मॉडल की राह पर कांग्रेस
कांग्रेस अब दिल्ली की रणनीति को बिहार में आजमाने जा रही है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के खिलाफ खुलकर लड़ा था, जिससे उसका वोट शेयर बढ़ा। यही फॉर्मूला अब बिहार में अपनाने की तैयारी है।
बंगाल में भी कांग्रेस ने स्पष्ट कर दिया कि टीएमसी की सरकार के खिलाफ मजबूती से लड़ेगी, चाहे राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन बना रहे या न बने। यही रणनीति अब बिहार में भी देखने को मिल सकती है।
कन्हैया और पप्पू यादव को सियासी मैदान में उतारकर कांग्रेस ने दिया आरजेडी को संदेश
कांग्रेस ने बिहार में अपने युवा नेताओं को एक्टिव करने की योजना बनाई है। इसी रणनीति के तहत कन्हैया कुमार ‘पलायन रोको, रोजगार दो’ पदयात्रा के जरिए युवाओं से सीधे जुड़ रहे हैं।
“अखिलेश प्रसाद सिंह कन्हैया को बिहार में ज्यादा एक्टिव करने के पक्ष में नहीं थे, क्योंकि इससे आरजेडी नाराज हो सकती थी। लेकिन कांग्रेस ने अब इसकी परवाह छोड़ दी है!”
इसके अलावा, कांग्रेस अब पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव को भी अहम जिम्मेदारी देने की तैयारी कर रही है। पप्पू यादव आरजेडी के विरोधी माने जाते हैं, और कांग्रेस के इस कदम से साफ है कि वह अब लालू यादव की परवाह किए बिना बिहार में अपनी स्वतंत्र राजनीति को आगे बढ़ाने का मन बना चुकी है।
क्या बिहार में कांग्रेस और आरजेडी के रिश्ते कमजोर हो रहे हैं?
इन बदलावों को देखते हुए राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस अब बिहार में आरजेडी की पिछलग्गू बनने के मूड में नहीं है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कांग्रेस और आरजेडी का गठबंधन बरकरार रहेगा या बिहार की राजनीति में नया मोड़ आएगा।
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