भारत की राजनीति में 90 के दशक की मंडल-कमंडल सियासत को भला कौन भूल सकता है? अब, 2014 से सत्ता में काबिज बीजेपी के हिंदुत्व एजेंडे के जवाब में कांग्रेस ने जातिगत राजनीति को धार देने की तैयारी कर ली है। राहुल गांधी 85% आबादी के वोटबैंक को साधने के लिए आरक्षण की सीमा तोड़ने की रणनीति अपना रहे हैं, जिसकी झलक तेलंगाना और बिहार में देखने को मिली।
तेलंगाना और बिहार में राहुल का बड़ा दांव
तेलंगाना में कांग्रेस सरकार ने आरक्षण की सीमा 50% से ऊपर ले जाने का फैसला किया, और इसके पीछे राहुल गांधी का सीधा दबाव बताया जा रहा है। बिहार में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला, जहां भूमिहार नेता अखिलेश प्रसाद सिंह की जगह दलित नेता राजेश राम को कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया। माना जा रहा है कि राहुल गांधी जातिगत समीकरणों को लेकर बड़े राजनीतिक कदम उठा रहे हैं।
एससी, एसटी, ओबीसी और माइनॉरिटी वोटों पर कांग्रेस की नजर
राहुल गांधी की रणनीति एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यकों के 85% वोट बैंक को साधने की है। इसके तहत कांग्रेस ने कर्नाटक में जातिगत जनगणना कराई, सरकारी ठेकों में माइनॉरिटी के लिए 4% आरक्षण लागू किया और संविधान सम्मेलन के जरिए दलित समुदाय को जोड़ने की कोशिश की।
बीजेपी बनाम कांग्रेस: हिंदुत्व बनाम जातीय राजनीति?
राहुल गांधी की यह रणनीति 90 के दशक की मंडल-कमंडल राजनीति की याद दिला रही है। बीजेपी जहां हिंदुत्व के एजेंडे पर आगे बढ़ रही है, वहीं कांग्रेस जातीय आरक्षण और सामाजिक न्याय के मुद्दे को धार दे रही है। कांग्रेस के इस रुख से राजद, सपा, डीएमके, जेएमएम जैसे पारंपरिक मंडल दल भी असहज हो सकते हैं, क्योंकि कांग्रेस अब उन्हीं के वोटबैंक पर दांव लगा रही है।
क्या कांग्रेस की नई सियासत गेमचेंजर बनेगी?
राहुल गांधी अब सवर्ण नेताओं के दबाव की परवाह किए बिना अपनी रणनीति आगे बढ़ा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या जातीय राजनीति का यह नया दांव कांग्रेस के लिए गेमचेंजर साबित होगा या फिर यह रणनीति उसे अन्य क्षेत्रीय दलों से टकराव की ओर ले जाएगी? लोकसभा चुनाव से पहले यह मुद्दा सियासी हलकों में बड़ा मोड़ ला सकता है।
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