एशिया के सबसे महत्वपूर्ण जल स्रोतों में से एक हिंदू कुश‑हिमालय (HKH) क्षेत्र गंभीर आर्थिक और जल संकट का सामना कर रहा है, जो न सिर्फ पर्वतीय पारिस्थितिकी पर प्रभाव डाल रहा है, बल्कि downstream यानी निचले इलाकों में रहने वाले करोड़ों लोगों के जीवन‑यापन एवं आर्थिक गतिविधियों को भी प्रभावित कर रहा है। हाल ही में जारी एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में क्षेत्र के सामने एक बहु‑ट्रिलियन डॉलर की क्लाइमेट‑फाइनेंसिंग (जलवायु वित्त) की कमी उजागर की गई है, जिससे चिंता की लहर दौड़ गई है।
इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, 2020 से 2050 तक HKH क्षेत्र को लगभग 12.065 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की आवश्यकता होगी ताकि वह जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना कर सके और सतत विकास के उपायों को अपनाकर अपने पारिस्थितिक तंत्र को संरक्षित रख सके। यह धनराशि सालाना लगभग 768.68 बिलियन डॉलर के बराबर है, जो मौजूदा वित्तीय प्रतिबद्धताओं से कहीं अधिक है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अनुमानित कुल जरूरत में से 92.4 प्रतिशत हिस्सेदारी चीन और भारत की जिम्मेदारी है, क्योंकि ये दोनों देश अपनी सीमा के भीतर HKH का सबसे बड़ा हिस्सा रखते हैं और इसके संसाधनों पर भारी निर्भर हैं। हालांकि वर्तमान वित्तीय प्रतिबद्धताएँ इन मौजूदा जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, जिससे क्षेत्र मरम्मत और अनुकूलन (adaptation) के चक्र में फँसा हुआ है।
हिंदू कुश‑हिमालय का महत्व केवल आर्थिक सहायता से ही सीमित नहीं है। यह क्षेत्र एशिया के “थर्ड पोल” के रूप में जाना जाता है, क्योंकि यहाँ बर्फ और ग्लेशियरों का विशाल भंडार है, जो गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु और मैकांग जैसे प्रमुख नदियों की जीवन‑रेखा हैं। ये नदियाँ दो अरब से अधिक लोगों को पेयजल, सिंचाई और ऊर्जा उपलब्ध कराती हैं।
लेकिन जलवायु परिवर्तन के चलते इस क्षेत्र में बर्फ की परत में तेज़ी से गिरावट देखने को मिल रही है। 2025 के Snow Update Report के अनुसार, इस क्षेत्र में तीन साल तक लगातार हिमपात सामान्य से नीचे रहा है और बर्फ की उपस्थिति पिछले 23 वर्षों में सबसे कम दर्ज हुई, जिससे जल सुरक्षा पर गंभीर खतरा पैदा हो गया है। बर्फ की इस कमी का सीधा असर नदी प्रवाह पर पड़ता है, क्योंकि हिमनदों के पिघलने से मिलने वाला पानी 12 प्रमुख नदी बेसिनों के कुल प्रवाह का करीब 23 प्रतिशत है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह संकट सिर्फ जल की कमी का नहीं है, बल्कि समाजिक और आर्थिक सुरक्षा का भी है। HKH क्षेत्र के निवासी पारंपरिक कृषि, पशुपालन और पर्यटन जैसी गतिविधियों पर निर्भर हैं, जिनका अस्तित्व मौसमी बदलावों और ग्लेशियर पिघलने वाली घटनाओं से प्रभावित हो रहा है। इससे पहाड़ों में रहने वाले समुदायों को अपने आजीविका के साधनों को सुरक्षित रखने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
रिपोर्ट ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि ग्लोबल वॉर्मिंग को नियंत्रित नहीं किया गया तो सदी के अंत तक यह क्षेत्र अपने 75 प्रतिशत बर्फ के भंडार को खो सकता है, जिससे downstream क्षेत्रों में जल प्रवाह और कम हो सकता है और सूखे की स्थितियाँ विकट हो सकती हैं।
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