अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी के हालिया भारत दौरे ने जहां दक्षिण एशिया की रणनीतिक दिशा में नई गर्माहट भरी है, वहीं पाकिस्तान को यह कूटनीतिक कदम रास नहीं आया। अफगान-भारत समीपता से बौखलाए पाकिस्तान ने एक बार फिर भ्रामक बयानबाज़ी का सहारा लिया है।
मुत्ताकी का यह दौरा दोनों देशों के बीच लंबे समय बाद उच्च स्तरीय बातचीत की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। भारत ने अफगानिस्तान के लोगों की मानवता आधारित सहायता, बुनियादी ढांचे और आपसी सहयोग को लेकर सकारात्मक संकेत दिए हैं। इसी कड़ी में भारतीय अधिकारियों से हुई बातचीत में अफगान प्रतिनिधिमंडल ने आर्थिक और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा की।
लेकिन इस सकारात्मक विकास को लेकर इस्लामाबाद की प्रतिक्रिया तीखी और अप्रत्याशित रही। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत “अफगानिस्तान में अपनी पैठ बढ़ाने के लिए राजनीतिक मंच का दुरुपयोग कर रहा है।” साथ ही यह भी आरोप लगाया कि भारत अफगानिस्तान की “तटस्थता” को प्रभावित कर रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की यह प्रतिक्रिया उसके क्षेत्रीय प्रभुत्व की चिंता को दर्शाती है। दरअसल, तालिबान शासन आने के बाद पाकिस्तान ने शुरू में अफगानिस्तान में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की थी, लेकिन धीरे-धीरे उसकी पकड़ कमजोर होती गई। अब जब अफगानिस्तान भारत के साथ एक बार फिर संवाद स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तो पाकिस्तान की चिंता और बेचैनी स्वाभाविक है।
विदेश नीति मामलों के विशेषज्ञों के अनुसार, भारत-अफगान रिश्तों की ऐतिहासिक गहराई और आपसी विश्वास की जड़ें बहुत पुरानी हैं। भारत ने अफगानिस्तान में स्कूल, अस्पताल, सड़कें और संसद भवन जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स में निवेश किया है। यही कारण है कि अफगान जनता के एक बड़े वर्ग में भारत को लेकर सकारात्मक भावना है।
भारत सरकार ने पाकिस्तान के आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन कूटनीतिक सूत्रों का कहना है कि भारत अपनी “Neighbourhood First Policy” के तहत अफगानिस्तान को मानवीय, आर्थिक और विकासात्मक सहायता देना जारी रखेगा।
इस पूरी घटनाक्रम से यह स्पष्ट हो गया है कि अफगानिस्तान की विदेश नीति अब धीरे-धीरे स्वतंत्र दिशा ले रही है और वह किसी एक देश की छत्रछाया में रहना नहीं चाहता।
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