आज के डिजिटल युग में मोबाइल फोन हर किसी की जेब या हाथ में शामिल है। कई लोग सोते समय भी फोन तकिए के पास रखते हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इस आदत से कैंसर या अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है? विशेषज्ञों और डॉक्टरों की राय इस विषय में जानना बेहद जरूरी है।
मोबाइल और रेडिएशन का संबंध
मोबाइल फोन से निकलने वाली रेडिएशन को रेडियोफ्रीक्वेंसी (RF) इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड्स कहा जाता है। यह रेडिएशन बहुत ही कम शक्ति का होता है और इसे वैज्ञानिक रूप से non-ionizing radiation के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इसका मतलब है कि यह सीधे DNA को नुकसान नहीं पहुंचाता।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अध्ययन के अनुसार, मोबाइल रेडिएशन और कैंसर के बीच सीधे प्रमाण अभी तक स्पष्ट नहीं हैं। कुछ अध्ययन बताते हैं कि लंबे समय तक अत्यधिक उपयोग से माइंड और कान के आसपास हल्की गर्मी महसूस हो सकती है, लेकिन कैंसर से सीधे जोड़ने वाले मजबूत प्रमाण नहीं मिले हैं।
सोते समय फोन रखने के प्रभाव
नींद पर असर: तकिए के पास फोन रखने से नीली रोशनी (blue light) और नोटिफिकेशन के कारण नींद की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
मानसिक तनाव: लगातार फोन के पास रहने से मानसिक तनाव और चिंता बढ़ सकती है।
सुरक्षा और जागरूकता: फोन तकिए पर रखते समय डिवाइस फॉल होने या शॉर्ट सर्किट की संभावना रहती है।
डॉक्टर की सलाह
फोन को कम से कम एक मीटर की दूरी पर रखें, खासकर सोते समय।
रात में एयरप्लेन मोड का इस्तेमाल करें या फोन को पूरी तरह बंद कर दें।
नीली रोशनी वाले डिस्प्ले से बचें ताकि नींद प्रभावित न हो।
बच्चों और किशोरों में फोन के पास सोने की आदत को नियंत्रित करें, क्योंकि उनकी संवेदनशीलता अधिक होती है।
सच और मिथक
मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म्स पर यह दावा अक्सर देखा जाता है कि फोन को तकिए के पास रखने से कैंसर हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस विषय में पुख़्ता वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं। हालांकि, फोन से निकलने वाली रेडिएशन से जुड़े अन्य छोटे जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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