125 यूनिट मुफ्त बिजली पर छिड़ी सियासत: ‘केजरीवाल मॉडल’ की छाया या चुनावी मजबूरी

बिहार में इस साल के अंत तक संभावित विधानसभा चुनावों से पहले सियासी तापमान चरम पर पहुंच गया है। चुनाव की तारीखों के औपचारिक ऐलान से पहले ही राजनीतिक दलों ने प्रचार और घोषणाओं की रफ्तार बढ़ा दी है। इस क्रम में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 125 यूनिट तक मुफ्त बिजली देने की घोषणा कर प्रदेश की जनता को बड़ी राहत दी, लेकिन अब इस फैसले को लेकर सियासी हलकों में तकरार शुरू हो गई है।

मुफ्त बिजली पर ‘आप’ का हमला
आम आदमी पार्टी (AAP) ने नीतीश कुमार की इस घोषणा को चुनावी मजबूरी बताया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनुराग ढांडा ने कहा कि नीतीश सरकार को ‘केजरीवाल मॉडल’ की बढ़ती लोकप्रियता के चलते यह घोषणा करनी पड़ी। उनके अनुसार, बिहार में पहली बार मुफ्त बिजली की बात होना ही यह दर्शाता है कि ‘आप’ की एंट्री ने चुनावी मुद्दों को बदल दिया है।

“आज देश की राजनीति में आम आदमी पार्टी ने एक नई दिशा दी है – जनहित, पारदर्शिता और बुनियादी सुविधाओं पर फोकस। बिहार की राजनीति में अब वही असर दिखने लगा है,” – अनुराग ढांडा

नीतीश सरकार पर कानून-व्यवस्था को लेकर निशाना
‘आप’ नेता ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की कार्यशैली और प्रशासन पर भी तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि 20 वर्षों तक मुख्यमंत्री रहने के बावजूद बिहार में कानून-व्यवस्था चरमराई हुई है। आए दिन हत्या, लूट, बलात्कार जैसी घटनाएं सामने आती हैं। उन्होंने नीतीश को ‘सुशासन बाबू से बीजेपी की कठपुतली’ बनने का आरोप लगाया।

नीतीश की योजना: मुफ्त बिजली और सोलर पावर
गौरतलब है कि नीतीश कुमार ने हाल ही में बिहार के 1.86 करोड़ घरेलू उपभोक्ताओं को 125 यूनिट मुफ्त बिजली देने की घोषणा की है। इसके अतिरिक्त 90% से अधिक उपभोक्ता इस योजना के अंतर्गत आ जाएंगे। सरकार के अनुसार, 2025-26 में इस योजना पर 3797 करोड़ रुपये का अतिरिक्त खर्च होगा।

राज्य सरकार सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए 1.1 किलोवाट क्षमता के रूफटॉप सोलर प्लांट भी लगाने जा रही है, खासकर कुटीर ज्योति उपभोक्ताओं के लिए। योजना का मकसद हरित ऊर्जा को बढ़ावा देना और बिजली की निर्भरता कम करना है।

जनता के मुद्दों पर चुनाव की तैयारी?
बिहार में यह साफ होता जा रहा है कि इस बार का चुनाव जातिगत समीकरणों के साथ-साथ जनहित की योजनाओं और प्रदर्शन के मुद्दों पर भी केंद्रित होगा। AAP की चुनौती भले ही संगठनात्मक रूप से बड़ी न हो, लेकिन उनकी रणनीति राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करने की है।

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